जीवन प्रक्रिया की निरन्तरता को समझाती श्रीकृष्ण की तत्वमीमांसा
प्रकाशित: 19-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
शिव शंकर द्विवेदी
श्रीकृष्ण के द्वारा प्रख्यापित तत्वमीमांसा पर विमर्श करने के उपरान्त भी यह सहज रूप से समझा जा सकता है कि श्रीकृष्ण ने क्यों दुःखों और सुखों के प्रति समभाव रखते हुए नियतकर्म करने का परामर्श दिया है?
श्रीकृष्ण की तत्वमीमांसा में समझाया गया है कि आत्मा, अजर, अमर कूटस्थ और शाश्वत है। आत्माओं के लिए जन्म,जरा और मरण की प्रक्रियाओं रहना स्वाभाविक और शाश्वत प्रक्रिया है। जो जन्म लेता है वह मरता है और जो मरता है वह जन्म लेता है। जन्म और मरण की इस प्रक्रिया को वस्त्र परिवर्तन से तुलना करके श्रीकृष्ण ने यह समझाया है कि इस प्रक्रिया से किसी की मुक्ति संभव नहीं है।
व्यक्ति स्वभाव के अधीन है
श्रीकृष्ण की तत्वमीमांसा में यह भी समझा गया है कि व्यक्ति स्वभाव या प्रकृति के आधीन काम करता है और स्वभाव ही प्रकृति है। संसार की प्रकृति ही परिवर्तनशील है जिसमें जन्म,जरा और मरण की प्रक्रियाओं का स्वाभाविक रूप से चलते ही रहना है। अत एव इनसे मुक्ति के लिए साधनाएं करने का कोई औचित्य नहीं है। जन्म,जरा और मरण से मुक्ति के लिए असाध्य साधनाओं को समझा कर श्रीकृष्ण ने एक ढंग से यह समझाने का प्रयास किया है कि लोग असाध्य साधनाओं को मूर्तरूप देने के उपक्रम से बचें और लोकहित में अपेक्षित कर्म अर्थात् नियत कर्म करें।
कर्मफल का ऋतम् मोक्ष के लिए बाधक है
श्रीकृष्ण द्वारा प्रख्यापित तत्वमीमांसा में कर्म-फल के ऋतम् को केन्द्र में रखकर विमर्श हुआ है। श्रीकृष्ण ने कर्म को आरम्भ हुई प्रक्रिया समझाते हुए समझाया है कि इस प्रक्रिया का विनाश संभव नहीं है क्योंकि यह अपने ऋतम् में गतिमान है। कर्म, फल सृजित करता है और उस सृजित फल को कर्म ही कर्म करने वाले को उपलब्ध कराता है,यही कर्म-फल का ऋतम् है। श्रीकृष्ण जोर देकर कहते हैं कि ऐसी कोई साधना नहीं है जो इस प्रक्रिया को समाप्त कर सके। वह समझाते हैं कि यदि कोई थोड़ा भी कर्म का आचरण कर लेता है तो वह महान् संकट से उबर जाता है-
नेहाभिक्रमनाशो?स्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।। श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय -2, श्लोक -40।।
ज्ञान सभी प्रकार के कर्मों को नष्ट करने में सक्षम नहीं है
आगे बढ़ने से पूर्व इस बात को समझना चाहिए कि श्रीकृष्ण ने ज्ञान से कर्म को भस्म होने वाला भी समझाया है-
यथैधांसि समिद्धो? ग्निर्भस्मसात्कुरुते?र्जुन, ज्ञानाग्नि सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।
श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय -4, श्लोक 37।।
उल्लेखनीय है कि श्रीकृष्ण उक्त श्लोक में जिस कर्म को ज्ञानाग्नि से भस्म होने योग्य समझा रहे हैं वह सकामभाव से किये जाने वाले कर्म हैं न कि वे कर्म जो नियतकर्मो की श्रेणी में हैं जिनके ऋतम् का उल्लेख उक्त वर्णित श्लोक 2-40 में किया गया है।
आत्मबुद्ध के लिए मोक्ष या भगवत् दर्शन लक्ष्य नहीं अभिलाषाएं हैं
तथ्य यह है कि जिस व्यक्ति को उसके होने का अर्थ बोध हो जाता है उसके लिए मोक्षसाधना या भगवत् दर्शन की साधना का कोई मतलब नहीं बचता है क्योंकि वह समझ लेता है कि वह मोक्षसाधना या भगवत् दर्शन की साधना के लिए है ही नहीं। अपनी प्रास्थिति को जानने वाले के लिए मोक्ष या भगवत् दर्शन एक अभिलाषा से अधिक नहीं महत्व रखते हैं क्योंकि उसके लिए तो महत्वपूर्ण वह होता है जिसकी उससे लोकहित में अपेक्षा की जा रही होती है।
स्थितप्रज्ञ न तो मुमुक्षु रह पाता है न भगवत् दर्शनाकांक्षी। वह तो केवल और केवल लोकहित में अपेक्षित कर्मों को निमित्तभूत होकर करने वाला ही होकर रह जाता है।
नियतकर्म सिद्धान्त जीवन की निरन्तरता का पोषक है
श्रीकृष्ण का नियतकर्म सिद्धान्त न समझ पाने वाले ही मोक्ष या भगवत् दर्शन की अभिलाषाओं को नियतकर्म समझते हैं और मोक्षसाधना या भगवत् दर्शन की साधनाओं को करते हुए स्वयं को मत्कर्मकृत हुआ समझ कर आश्वस्त हो लेते हैं कि अब तो वे मुक्त हो ही जायेंगे।
श्रीकृष्ण ने नियतकर्म को समझाते हुए नियतकर्मों को यज्ञार्थ किये जाने वाले कर्म कहा है। इस प्रकार के कर्मों को उन्होंने बन्धन कारक नहीं समझा है-
यज्ञार्थात्कर्मणो?न्यत्र लोको?यं कर्मबन्धन: । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ।।
श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय -3, श्लोक -9।।
लोकव्यवस्थापक ही नियतकर्मों के विषयों के निर्धारक होते हैं
स्पष्ट है कि नियतकर्म वे कर्म हैं जो लोकहित में गुण और कर्मो की प्रकृति के आधार पर लोगों से अपेक्षित होते हैं जिनके विषयों का निर्धारण लोकहित को ध्यान में रखते हुए लोक व्यवस्थापक ही करते हैं। श्रीकृष्ण ने जोर देकर लोगों को नियत कर्मों के विषयों के निर्धारण की प्रक्रिया से दूर रहने का परामर्श दिया है। ऐसे में कोई ईश्वर आराधना को नियतकर्म समझ रहा है तो वह श्रीकृष्ण के नियतकर्मसिद्धान्तों को न समझने वाला अहंकार से विमूढ़ ही है क्योंकि ईश्वर की आराधना किसी की व्यक्तिगत इच्छा हो सकती है जिसे यदि वह अपने लिए नियतकर्म के रूप में समझता है तो निश्चित ही वह श्रीकृष्ण की दृष्टि में मूढ़ है।
नियतकर्मों के नियोक्ताओं से भी अपेक्षा है कि वे भी निमित्त मात्र बनें
श्रीकृष्ण ने नियतकर्म करने वालों की अर्हताएं निर्धारित की हैं उनमें एक यह भी है कि नियतकर्म करने वाले स्वयं को निमित्त मात्र समझें। श्रीकृष्ण ने स्वयं को भी निमित्त मात्र समझते हुए ही लोकव्यवस्था के लिए गुण और कर्मों की प्रकृति के आधार पर लोगों के लिए नियतकर्मों को निर्धारित किया है। जब वह लोगों के लिए नियतकर्म निर्धारित करते हैं तब वह कर्ता की हैसियत से होते हैं किन्तु जब वह लोगों के लिए नियतकर्म के विषयों का चयन करते हैं तब वह चयन की इस प्रक्रिया में निमित्त मात्र होते हैं। इसी स्थिति को उन्होंने अकर्ता की स्थिति में होना समझाया है। स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्थात् परमात्मा भी नियतकर्मों की परिधि से बाहर नहीं हैं। उनके भी हाथ कर्म-फल के ऋतम् से बधे हैं। वह किसी से भी अपेक्षा नहीं कर सकते हैं कि कोई उनकी आराधना करे क्योंकि नियतकर्म निर्धारित करते समय उन्हें स्वहित का नहीं अपितु लोकहित का ध्यान रखना होता है।
स्पष्ट है कि ईश्वर की हैसियत से वह ईश्वर की आराधना को किसी के नियतकर्म के रूप में निर्धारित करने के लिए अधिकृत नहीं हैं। यदि ऐसा करते हैं तो वह स्वहित पोषक मात्र होकर रह जायेंगे जिससे कर्म-फल का ऋतम् ही नष्ट नहीं होगा अपितु उनके वैरागी होने का अर्थ भी नहीं रह सकेगा।
नियतकर्म और परिणाम
नियतकर्म का परिणाम नियतकर्म के विषयों के निर्धारण करने वाले प्राप्त करते हैं न कि वे जो नियतकर्म करते हैं। जो निमित्त की भूमिका में होकर नियतकर्म करते हैं वे नियतकर्म कर पाने या नियतकर्म न कर पाने का ही परिणाम प्राप्त करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक संख्या 33-37 में इसका विधिवत उल्लेख है। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस संसार में दो श्रेणियों के ही लोग हैं - एक वे हैं जो नियत कर्म कर पाते हैं और दूसरे वे हैं जो नियतकर्म नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी संसार के आवागमन की प्रक्रिया से मुक्त नहीं हो पाते हैं क्योंकि उन्हें अपने द्वारा किये गये नियतकर्मो को कर पाने अथवा न कर पाने का परिणाम भुगतने के लिए सृष्टिप्रािढया में रहना ही पड़ता है। इस प्रकार समझा जा सकता है कि यह भी एक कारण है जिसके आधार पर श्रीकृष्ण ने लोगों को मुक्ति साधना या भगवत् दर्शन की साधना या सुख-दुखों के प्रति उदासीन रहने की साधनाओं से दूर रहने का परामर्श देते हुए नियतकर्म करने का परामर्श दिया है।
परमात्मा आश्वासन देने में सक्षम नहीं हैं
श्रीकृष्ण समझते थे कि ऋतम् के लिए प्रतिबद्ध सत्ता किसी के लिए ऐसा कोई आश्वासन दे ही नहीं सकती है जो ऋतम् को अव्यवस्थित कर दे। जब संसार के लोग मरणधर्मा हैं तो उन्हें जन्म,जरा और मरण की प्रािढया से मुक्त करने या उन्हें कर्म-फल की व्यवस्था का उल्लंघन करते हुए कोई लाभ देने का आश्वासन, ऋतम् के लिए प्रतिबद्ध कोई सत्ता, नहीं दे सकती है और यदि देती है तो सुनिश्चित है कि उसके द्वारा इस प्रकार ऋतम् को अव्यवस्थित करने वाले आश्वासन पूर्ण नहीं हो सकते हैं।
आश्वासनों की समीक्षा का परामर्श ही जीवन प्रक्रिया की निरन्तरता को स्थापित करती है
ऋतम् के लिए प्रतिबद्ध सत्ता से ऋतम् को अव्यवस्थित करने वाले आश्वासनों की समीक्षा का साहस अर्जुन की तरह विमर्श करने वाले ही जुटा सकते हैं। इस तरह का साहस रखने वाले विवेकी व्यक्ति ही आश्वासनों को अपामित करते हुए वह करते हैं जिसकी उनसे लोकहित में अपेक्षा होती है। यही कारण रहा कि श्रीकृष्ण ने श्रद्धा पूर्वक ज्ञान प्राप्त करते हुए प्राप्त ज्ञान पर विमर्श के उपरान्त निर्णय लेने का परामर्श दिया है। उपलब्ध ज्ञान पर विमर्श का परामर्श ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि श्रीकृष्ण की मंशा किसी को न मुक्त करने की थी न किसी को भगवत् साक्षात्कार कराने की थी न वह किसी को मोक्ष के लिए प्रेरित करना चाहते थे न यह चाहते थे कि लोग भगवत् दर्शन के लिए साधनाएं करें अपितु वह सभी से यही चाहते थे कि लोग लोकहित में लोक व्यवस्थापकों द्वारा नियत, कर्म ही करें। अत एव यह व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है कि वह श्रीकृष्ण के वचनों का पालन करे या अपनी अभिलाषाओं को पूर्ण करने की साधना करे।
(लेखक पूर्व संयुक्त सचिव,उ.प्र.शासन हैं।)
श्रीकृष्ण के द्वारा प्रख्यापित तत्वमीमांसा पर विमर्श करने के उपरान्त भी यह सहज रूप से समझा जा सकता है कि श्रीकृष्ण ने क्यों दुःखों और सुखों के प्रति समभाव रखते हुए नियतकर्म करने का परामर्श दिया है?
श्रीकृष्ण की तत्वमीमांसा में समझाया गया है कि आत्मा, अजर, अमर कूटस्थ और शाश्वत है। आत्माओं के लिए जन्म,जरा और मरण की प्रक्रियाओं रहना स्वाभाविक और शाश्वत प्रक्रिया है। जो जन्म लेता है वह मरता है और जो मरता है वह जन्म लेता है। जन्म और मरण की इस प्रक्रिया को वस्त्र परिवर्तन से तुलना करके श्रीकृष्ण ने यह समझाया है कि इस प्रक्रिया से किसी की मुक्ति संभव नहीं है।
व्यक्ति स्वभाव के अधीन है
श्रीकृष्ण की तत्वमीमांसा में यह भी समझा गया है कि व्यक्ति स्वभाव या प्रकृति के आधीन काम करता है और स्वभाव ही प्रकृति है। संसार की प्रकृति ही परिवर्तनशील है जिसमें जन्म,जरा और मरण की प्रक्रियाओं का स्वाभाविक रूप से चलते ही रहना है। अत एव इनसे मुक्ति के लिए साधनाएं करने का कोई औचित्य नहीं है। जन्म,जरा और मरण से मुक्ति के लिए असाध्य साधनाओं को समझा कर श्रीकृष्ण ने एक ढंग से यह समझाने का प्रयास किया है कि लोग असाध्य साधनाओं को मूर्तरूप देने के उपक्रम से बचें और लोकहित में अपेक्षित कर्म अर्थात् नियत कर्म करें।
कर्मफल का ऋतम् मोक्ष के लिए बाधक है
श्रीकृष्ण द्वारा प्रख्यापित तत्वमीमांसा में कर्म-फल के ऋतम् को केन्द्र में रखकर विमर्श हुआ है। श्रीकृष्ण ने कर्म को आरम्भ हुई प्रक्रिया समझाते हुए समझाया है कि इस प्रक्रिया का विनाश संभव नहीं है क्योंकि यह अपने ऋतम् में गतिमान है। कर्म, फल सृजित करता है और उस सृजित फल को कर्म ही कर्म करने वाले को उपलब्ध कराता है,यही कर्म-फल का ऋतम् है। श्रीकृष्ण जोर देकर कहते हैं कि ऐसी कोई साधना नहीं है जो इस प्रक्रिया को समाप्त कर सके। वह समझाते हैं कि यदि कोई थोड़ा भी कर्म का आचरण कर लेता है तो वह महान् संकट से उबर जाता है-
नेहाभिक्रमनाशो?स्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।। श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय -2, श्लोक -40।।
ज्ञान सभी प्रकार के कर्मों को नष्ट करने में सक्षम नहीं है
आगे बढ़ने से पूर्व इस बात को समझना चाहिए कि श्रीकृष्ण ने ज्ञान से कर्म को भस्म होने वाला भी समझाया है-
यथैधांसि समिद्धो? ग्निर्भस्मसात्कुरुते?र्जुन, ज्ञानाग्नि सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।।
श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय -4, श्लोक 37।।
उल्लेखनीय है कि श्रीकृष्ण उक्त श्लोक में जिस कर्म को ज्ञानाग्नि से भस्म होने योग्य समझा रहे हैं वह सकामभाव से किये जाने वाले कर्म हैं न कि वे कर्म जो नियतकर्मो की श्रेणी में हैं जिनके ऋतम् का उल्लेख उक्त वर्णित श्लोक 2-40 में किया गया है।
आत्मबुद्ध के लिए मोक्ष या भगवत् दर्शन लक्ष्य नहीं अभिलाषाएं हैं
तथ्य यह है कि जिस व्यक्ति को उसके होने का अर्थ बोध हो जाता है उसके लिए मोक्षसाधना या भगवत् दर्शन की साधना का कोई मतलब नहीं बचता है क्योंकि वह समझ लेता है कि वह मोक्षसाधना या भगवत् दर्शन की साधना के लिए है ही नहीं। अपनी प्रास्थिति को जानने वाले के लिए मोक्ष या भगवत् दर्शन एक अभिलाषा से अधिक नहीं महत्व रखते हैं क्योंकि उसके लिए तो महत्वपूर्ण वह होता है जिसकी उससे लोकहित में अपेक्षा की जा रही होती है।
स्थितप्रज्ञ न तो मुमुक्षु रह पाता है न भगवत् दर्शनाकांक्षी। वह तो केवल और केवल लोकहित में अपेक्षित कर्मों को निमित्तभूत होकर करने वाला ही होकर रह जाता है।
नियतकर्म सिद्धान्त जीवन की निरन्तरता का पोषक है
श्रीकृष्ण का नियतकर्म सिद्धान्त न समझ पाने वाले ही मोक्ष या भगवत् दर्शन की अभिलाषाओं को नियतकर्म समझते हैं और मोक्षसाधना या भगवत् दर्शन की साधनाओं को करते हुए स्वयं को मत्कर्मकृत हुआ समझ कर आश्वस्त हो लेते हैं कि अब तो वे मुक्त हो ही जायेंगे।
श्रीकृष्ण ने नियतकर्म को समझाते हुए नियतकर्मों को यज्ञार्थ किये जाने वाले कर्म कहा है। इस प्रकार के कर्मों को उन्होंने बन्धन कारक नहीं समझा है-
यज्ञार्थात्कर्मणो?न्यत्र लोको?यं कर्मबन्धन: । तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ।।
श्रीमद्भगवद्गीता,अध्याय -3, श्लोक -9।।
लोकव्यवस्थापक ही नियतकर्मों के विषयों के निर्धारक होते हैं
स्पष्ट है कि नियतकर्म वे कर्म हैं जो लोकहित में गुण और कर्मो की प्रकृति के आधार पर लोगों से अपेक्षित होते हैं जिनके विषयों का निर्धारण लोकहित को ध्यान में रखते हुए लोक व्यवस्थापक ही करते हैं। श्रीकृष्ण ने जोर देकर लोगों को नियत कर्मों के विषयों के निर्धारण की प्रक्रिया से दूर रहने का परामर्श दिया है। ऐसे में कोई ईश्वर आराधना को नियतकर्म समझ रहा है तो वह श्रीकृष्ण के नियतकर्मसिद्धान्तों को न समझने वाला अहंकार से विमूढ़ ही है क्योंकि ईश्वर की आराधना किसी की व्यक्तिगत इच्छा हो सकती है जिसे यदि वह अपने लिए नियतकर्म के रूप में समझता है तो निश्चित ही वह श्रीकृष्ण की दृष्टि में मूढ़ है।
नियतकर्मों के नियोक्ताओं से भी अपेक्षा है कि वे भी निमित्त मात्र बनें
श्रीकृष्ण ने नियतकर्म करने वालों की अर्हताएं निर्धारित की हैं उनमें एक यह भी है कि नियतकर्म करने वाले स्वयं को निमित्त मात्र समझें। श्रीकृष्ण ने स्वयं को भी निमित्त मात्र समझते हुए ही लोकव्यवस्था के लिए गुण और कर्मों की प्रकृति के आधार पर लोगों के लिए नियतकर्मों को निर्धारित किया है। जब वह लोगों के लिए नियतकर्म निर्धारित करते हैं तब वह कर्ता की हैसियत से होते हैं किन्तु जब वह लोगों के लिए नियतकर्म के विषयों का चयन करते हैं तब वह चयन की इस प्रक्रिया में निमित्त मात्र होते हैं। इसी स्थिति को उन्होंने अकर्ता की स्थिति में होना समझाया है। स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण अर्थात् परमात्मा भी नियतकर्मों की परिधि से बाहर नहीं हैं। उनके भी हाथ कर्म-फल के ऋतम् से बधे हैं। वह किसी से भी अपेक्षा नहीं कर सकते हैं कि कोई उनकी आराधना करे क्योंकि नियतकर्म निर्धारित करते समय उन्हें स्वहित का नहीं अपितु लोकहित का ध्यान रखना होता है।
स्पष्ट है कि ईश्वर की हैसियत से वह ईश्वर की आराधना को किसी के नियतकर्म के रूप में निर्धारित करने के लिए अधिकृत नहीं हैं। यदि ऐसा करते हैं तो वह स्वहित पोषक मात्र होकर रह जायेंगे जिससे कर्म-फल का ऋतम् ही नष्ट नहीं होगा अपितु उनके वैरागी होने का अर्थ भी नहीं रह सकेगा।
नियतकर्म और परिणाम
नियतकर्म का परिणाम नियतकर्म के विषयों के निर्धारण करने वाले प्राप्त करते हैं न कि वे जो नियतकर्म करते हैं। जो निमित्त की भूमिका में होकर नियतकर्म करते हैं वे नियतकर्म कर पाने या नियतकर्म न कर पाने का ही परिणाम प्राप्त करते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 2 के श्लोक संख्या 33-37 में इसका विधिवत उल्लेख है। यहां यह उल्लेखनीय है कि इस संसार में दो श्रेणियों के ही लोग हैं - एक वे हैं जो नियत कर्म कर पाते हैं और दूसरे वे हैं जो नियतकर्म नहीं कर पाते हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी संसार के आवागमन की प्रक्रिया से मुक्त नहीं हो पाते हैं क्योंकि उन्हें अपने द्वारा किये गये नियतकर्मो को कर पाने अथवा न कर पाने का परिणाम भुगतने के लिए सृष्टिप्रािढया में रहना ही पड़ता है। इस प्रकार समझा जा सकता है कि यह भी एक कारण है जिसके आधार पर श्रीकृष्ण ने लोगों को मुक्ति साधना या भगवत् दर्शन की साधना या सुख-दुखों के प्रति उदासीन रहने की साधनाओं से दूर रहने का परामर्श देते हुए नियतकर्म करने का परामर्श दिया है।
परमात्मा आश्वासन देने में सक्षम नहीं हैं
श्रीकृष्ण समझते थे कि ऋतम् के लिए प्रतिबद्ध सत्ता किसी के लिए ऐसा कोई आश्वासन दे ही नहीं सकती है जो ऋतम् को अव्यवस्थित कर दे। जब संसार के लोग मरणधर्मा हैं तो उन्हें जन्म,जरा और मरण की प्रािढया से मुक्त करने या उन्हें कर्म-फल की व्यवस्था का उल्लंघन करते हुए कोई लाभ देने का आश्वासन, ऋतम् के लिए प्रतिबद्ध कोई सत्ता, नहीं दे सकती है और यदि देती है तो सुनिश्चित है कि उसके द्वारा इस प्रकार ऋतम् को अव्यवस्थित करने वाले आश्वासन पूर्ण नहीं हो सकते हैं।
आश्वासनों की समीक्षा का परामर्श ही जीवन प्रक्रिया की निरन्तरता को स्थापित करती है
ऋतम् के लिए प्रतिबद्ध सत्ता से ऋतम् को अव्यवस्थित करने वाले आश्वासनों की समीक्षा का साहस अर्जुन की तरह विमर्श करने वाले ही जुटा सकते हैं। इस तरह का साहस रखने वाले विवेकी व्यक्ति ही आश्वासनों को अपामित करते हुए वह करते हैं जिसकी उनसे लोकहित में अपेक्षा होती है। यही कारण रहा कि श्रीकृष्ण ने श्रद्धा पूर्वक ज्ञान प्राप्त करते हुए प्राप्त ज्ञान पर विमर्श के उपरान्त निर्णय लेने का परामर्श दिया है। उपलब्ध ज्ञान पर विमर्श का परामर्श ही यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि श्रीकृष्ण की मंशा किसी को न मुक्त करने की थी न किसी को भगवत् साक्षात्कार कराने की थी न वह किसी को मोक्ष के लिए प्रेरित करना चाहते थे न यह चाहते थे कि लोग भगवत् दर्शन के लिए साधनाएं करें अपितु वह सभी से यही चाहते थे कि लोग लोकहित में लोक व्यवस्थापकों द्वारा नियत, कर्म ही करें। अत एव यह व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है कि वह श्रीकृष्ण के वचनों का पालन करे या अपनी अभिलाषाओं को पूर्ण करने की साधना करे।
(लेखक पूर्व संयुक्त सचिव,उ.प्र.शासन हैं।)