नशा मुक्त पंजाब: नारा कितना, काम कितना
प्रकाशित: 23-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
विवेक शुक्ला
अब कुछ ही महीनों के बाद पंजाब विधान सभा के चुनाव होने हैं। इस बार भी पंजाब का चुनाव नशे के मुद्दे पर लड़ने की कवायद शुरू हो गई है। जो पार्टी इस समय सत्ता में है, उसने भी पिछली बार पंजाब को छह माह के भीतर नशा का कारोबार एक दम खत्म करने के वायदे के साथ ही लोगों के पास गई थी, अब पांच साल बाद भी नशे में अब भी डूबे पंजाब के लिए राजनीतिक और विदेशी कारणों की रट्ट लगा रही है। क्या देश में फैले नशे का कारोबार केवल राजनीतिक मुद्दा है और उससे भी आगे, क्या यह केवल पंजाब की समस्या है। कदापि नहीं।
नशा का कारोबार पूरी दुनिया की समस्या है और हमारे लिए एक राष्ट्रीय आपदा है। जिसके निराकरण के लिए राष्ट्रीय संकल्प की जरूरत है। ठीक उसी तरह, जिस तरह हमने देश से नक्सलवाद को खत्म करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक अभियान शुरू किया और सभी पीड़ित राज्यों ने मोदी सरकार के साथ कंधे से कंधे मिलाकर काम किया। प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे देश को नशा मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित कर दिया है और गृह मंत्री अमित शाह इस अभियान की सफलता के सारे विकल्प पर काम कर रहे हैं। नशे की लत एक दिन में नहीं लगती, शुरुआत मज़े के लिए होती है। कुछ लोगों के लिए स्टेटस सिंबल भी बन जाता है। लेकिन यही शौक और दिखावा ड्रग्स की लत में बदल जाते हैं। इसमें डूबे लोग धन, धर्म के साथ अपनी जान भी गवां रहे हैं। इसके कारोबार से जुड़े लोग बड़े अपराध की ओर निकल जाते हैं।
ड्रग एडिक्ट्स को कैसे सामान्य और सहज जिंदगी में वापस लाए, ये सवाल सभी सरकारों के सामने हैं। कोई भी थेरेपी या इलाज तब तक कामयाब नहीं हो सकते, जब तक कि नारकोटिक्स की आपूर्ति पूरी तरह से ना रुके। सोच और व्यवहार के पैटर्न को केवल समझा बुझा कर नहीं बदल सकते। कई बार नशा छुड़ाने की जबरदस्ती जानलेवा साबित हुईं है।
नशे की लत एक बीमारी है। केवल शारीरिक नहीं, सामाजिक भी और पारिवारिक भी। यह समस्या स्थानिक भी है और राष्ट्रीय भी। नशे का अपराध की दुनिया से भी गहरा ताल्लुक है। इसके तार लोकल अपराधियों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय सिंडीकेट तक जुड़े हैं। इसलिए इसके खिलाफ लड़ाई भी बड़ी तैयारियों के साथ ही जीती जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में इस लड़ाई की काफी वृहद रणनीति बनाई गई है। इसके किरदारों में प्रवर्तन एजेंसियों, राज्य सरकारों और आम नागरिकों को भी शामिल किया गया है। यानी पूरी सरकार और पूरे समाज की भागीदारी का दृष्टिकोण अपनाया गया है।
गृह मंत्री अमित शाह ने 2019 में ही ड्रग के नेटवर्क से निपटने के लिए एक समन्वित अभियान की रूप रेखा तय कर दी थी। एक स्पष्ट रोड मैप के साथ कारवाई आगे बढ़ाने की योजना पर काम चल भी रहा है। वर्ष 2029 तक भारत को नशा-मुक्त देश बनाने का संकल्प लिया गया है। अगर भारत को 2047 तक विकसित देश बनाना है तो भारत को नशे के कारोबार और आदत को समाप्त करना ही होगा। इसी साल जून में गृह मंत्री ने ड्रग नियंत्रण 2026-2029 पर एक विजन डॉक्यूमेंट भी जारी किया, जिसमें अगले तीन साल का स्पष्ट रोडमैप तैयार है। ड्रग्स के खिलाफ इस राष्ट्रीय मुहिम में खुफिया जानकारी और उसके आधार पर ऑपरेशन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। प्रीकर्सर और सिंथेटिक ड्रग के पूर्ण खात्मे या उसकी आपूर्ति पर पूर्ण रोक का लक्ष्य तय कर काम शुरू कर दिया गया है। ड्रग्स से इस कारोबार को जड़ से खत्म करने के लिए अमित शाह ने थ्री डी का फार्मूला तय किया है, डिटेक्ट यानी ड्रग्स का पता लगाना, डिस्रप्ट यानी उसको लोगों तक आने से रोकना और डिस्ट्रॉय यानी उसे पूरी तरह नष्ट कर देना।
चूंकि नशे के अंर्तरराष्ट्रीय गिरोहों से पार पाने की यह लड़ाई है, इसलिए तैयारी भी उसी के अनुरूप की गई है।
बात पंजाब की करें तो मोदी सरकार ने यहाँ के ड्रग्स संकट को चुनाव से परे जाकर देखा है। सबसे ज्यादा प्रभावित पंजाब के छह जिलों - अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन, लुधियाना, फिरोजपुर और फाजिल्का - को 'अति-संवेदनशील ड्रग जोन के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इनमें से पांच जिले तो पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे हैं और यहाँ सीमा-पार से तस्करी ड्रोन से होने के तमाम सबूत हैं। गृह मंत्रालय ने मार्च 2027 तक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर एंटी-ड्रोन टेक्नोलॉजी और एडवांस्ड सर्विलांस सिस्टम लगाने का लक्ष्य तय कर रखा है। यही नहीं पंजाब में नार्को-टेररिज्म से जुड़े लगभग 100 भगोड़ों की पहचान कर ली गई है और उन पर कार्रवाई की जा रही है।
पंजाब ही नहीं पूरे देश में 100 से ज्यादा बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क चल रहे थे, उनको भी खत्म करने का ऑपरेशन चल रहा है। और इसमें सफलता भी मिली है। एजेंसियों ने 2019 और जुलाई 2026 के बीच, लगभग 1.53 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के 93.3 लाख किलोग्राम से अधिक नशीले और साइकोट्रोपिक पदार्थ जब्त किए हैं। मोदी सरकार की ड्रग्स के खिलाफ 'ज़ीरो-टॉलरेंस' नीति के तहत, एजेंसियों ने विदेश से अपराधियों को वापस लाने की कारवाई तेज कर दी है। देश के अंदर भी छापेमारी और बड़े ड्रग सिंडिकेट के सदस्यों की गिरफ्तारियाँ हो रही हैं। अकेले 2024 में 25,330 करोड़ की ड्रग्स ज़ब्त की गईं। हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारियों में वीरेंद्र सिंह बसोया का भी नाम शामिल है जिसे इसी साल अगस्त में यूएई से पकड़ कर लाया गया। ऑपरेशन ग्लोबल-हंट के तहत मोहम्मद सलीम डोला को तुर्की से भारत लाया गया। राजस्थान में छापेमारी कर 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
गृह मंत्री मार्च 2029 तक पूर्ण नशा-मुक्ति के संकल्प को पूरा करने के लिए पूरे देश में नार्को को ऑर्डिनेशन सेंटर की संख्या 334 से बढ़ाकर 1,751 करने जा रहे है। पंजाब के लोगों को जाग्रत करने के लिए बीजेपी ने नशा मुक्त पंजाब की यात्राएं' शुरू की हैं। यह अभियान 30 सितंबर को जालंधर में समाप्त होगा, जहां खुद गृह मंत्री लोगों को संबोधित कर सकते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
अब कुछ ही महीनों के बाद पंजाब विधान सभा के चुनाव होने हैं। इस बार भी पंजाब का चुनाव नशे के मुद्दे पर लड़ने की कवायद शुरू हो गई है। जो पार्टी इस समय सत्ता में है, उसने भी पिछली बार पंजाब को छह माह के भीतर नशा का कारोबार एक दम खत्म करने के वायदे के साथ ही लोगों के पास गई थी, अब पांच साल बाद भी नशे में अब भी डूबे पंजाब के लिए राजनीतिक और विदेशी कारणों की रट्ट लगा रही है। क्या देश में फैले नशे का कारोबार केवल राजनीतिक मुद्दा है और उससे भी आगे, क्या यह केवल पंजाब की समस्या है। कदापि नहीं।
नशा का कारोबार पूरी दुनिया की समस्या है और हमारे लिए एक राष्ट्रीय आपदा है। जिसके निराकरण के लिए राष्ट्रीय संकल्प की जरूरत है। ठीक उसी तरह, जिस तरह हमने देश से नक्सलवाद को खत्म करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक अभियान शुरू किया और सभी पीड़ित राज्यों ने मोदी सरकार के साथ कंधे से कंधे मिलाकर काम किया। प्रधानमंत्री मोदी ने पूरे देश को नशा मुक्त करने का लक्ष्य निर्धारित कर दिया है और गृह मंत्री अमित शाह इस अभियान की सफलता के सारे विकल्प पर काम कर रहे हैं। नशे की लत एक दिन में नहीं लगती, शुरुआत मज़े के लिए होती है। कुछ लोगों के लिए स्टेटस सिंबल भी बन जाता है। लेकिन यही शौक और दिखावा ड्रग्स की लत में बदल जाते हैं। इसमें डूबे लोग धन, धर्म के साथ अपनी जान भी गवां रहे हैं। इसके कारोबार से जुड़े लोग बड़े अपराध की ओर निकल जाते हैं।
ड्रग एडिक्ट्स को कैसे सामान्य और सहज जिंदगी में वापस लाए, ये सवाल सभी सरकारों के सामने हैं। कोई भी थेरेपी या इलाज तब तक कामयाब नहीं हो सकते, जब तक कि नारकोटिक्स की आपूर्ति पूरी तरह से ना रुके। सोच और व्यवहार के पैटर्न को केवल समझा बुझा कर नहीं बदल सकते। कई बार नशा छुड़ाने की जबरदस्ती जानलेवा साबित हुईं है।
नशे की लत एक बीमारी है। केवल शारीरिक नहीं, सामाजिक भी और पारिवारिक भी। यह समस्या स्थानिक भी है और राष्ट्रीय भी। नशे का अपराध की दुनिया से भी गहरा ताल्लुक है। इसके तार लोकल अपराधियों से लेकर अंतर्राष्ट्रीय सिंडीकेट तक जुड़े हैं। इसलिए इसके खिलाफ लड़ाई भी बड़ी तैयारियों के साथ ही जीती जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के मार्गदर्शन में इस लड़ाई की काफी वृहद रणनीति बनाई गई है। इसके किरदारों में प्रवर्तन एजेंसियों, राज्य सरकारों और आम नागरिकों को भी शामिल किया गया है। यानी पूरी सरकार और पूरे समाज की भागीदारी का दृष्टिकोण अपनाया गया है।
गृह मंत्री अमित शाह ने 2019 में ही ड्रग के नेटवर्क से निपटने के लिए एक समन्वित अभियान की रूप रेखा तय कर दी थी। एक स्पष्ट रोड मैप के साथ कारवाई आगे बढ़ाने की योजना पर काम चल भी रहा है। वर्ष 2029 तक भारत को नशा-मुक्त देश बनाने का संकल्प लिया गया है। अगर भारत को 2047 तक विकसित देश बनाना है तो भारत को नशे के कारोबार और आदत को समाप्त करना ही होगा। इसी साल जून में गृह मंत्री ने ड्रग नियंत्रण 2026-2029 पर एक विजन डॉक्यूमेंट भी जारी किया, जिसमें अगले तीन साल का स्पष्ट रोडमैप तैयार है। ड्रग्स के खिलाफ इस राष्ट्रीय मुहिम में खुफिया जानकारी और उसके आधार पर ऑपरेशन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। प्रीकर्सर और सिंथेटिक ड्रग के पूर्ण खात्मे या उसकी आपूर्ति पर पूर्ण रोक का लक्ष्य तय कर काम शुरू कर दिया गया है। ड्रग्स से इस कारोबार को जड़ से खत्म करने के लिए अमित शाह ने थ्री डी का फार्मूला तय किया है, डिटेक्ट यानी ड्रग्स का पता लगाना, डिस्रप्ट यानी उसको लोगों तक आने से रोकना और डिस्ट्रॉय यानी उसे पूरी तरह नष्ट कर देना।
चूंकि नशे के अंर्तरराष्ट्रीय गिरोहों से पार पाने की यह लड़ाई है, इसलिए तैयारी भी उसी के अनुरूप की गई है।
बात पंजाब की करें तो मोदी सरकार ने यहाँ के ड्रग्स संकट को चुनाव से परे जाकर देखा है। सबसे ज्यादा प्रभावित पंजाब के छह जिलों - अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन, लुधियाना, फिरोजपुर और फाजिल्का - को 'अति-संवेदनशील ड्रग जोन के रूप में वर्गीकृत किया गया है। इनमें से पांच जिले तो पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमा से लगे हैं और यहाँ सीमा-पार से तस्करी ड्रोन से होने के तमाम सबूत हैं। गृह मंत्रालय ने मार्च 2027 तक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर एंटी-ड्रोन टेक्नोलॉजी और एडवांस्ड सर्विलांस सिस्टम लगाने का लक्ष्य तय कर रखा है। यही नहीं पंजाब में नार्को-टेररिज्म से जुड़े लगभग 100 भगोड़ों की पहचान कर ली गई है और उन पर कार्रवाई की जा रही है।
पंजाब ही नहीं पूरे देश में 100 से ज्यादा बड़े राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय ड्रग नेटवर्क चल रहे थे, उनको भी खत्म करने का ऑपरेशन चल रहा है। और इसमें सफलता भी मिली है। एजेंसियों ने 2019 और जुलाई 2026 के बीच, लगभग 1.53 लाख करोड़ रुपये के मूल्य के 93.3 लाख किलोग्राम से अधिक नशीले और साइकोट्रोपिक पदार्थ जब्त किए हैं। मोदी सरकार की ड्रग्स के खिलाफ 'ज़ीरो-टॉलरेंस' नीति के तहत, एजेंसियों ने विदेश से अपराधियों को वापस लाने की कारवाई तेज कर दी है। देश के अंदर भी छापेमारी और बड़े ड्रग सिंडिकेट के सदस्यों की गिरफ्तारियाँ हो रही हैं। अकेले 2024 में 25,330 करोड़ की ड्रग्स ज़ब्त की गईं। हाई-प्रोफाइल गिरफ्तारियों में वीरेंद्र सिंह बसोया का भी नाम शामिल है जिसे इसी साल अगस्त में यूएई से पकड़ कर लाया गया। ऑपरेशन ग्लोबल-हंट के तहत मोहम्मद सलीम डोला को तुर्की से भारत लाया गया। राजस्थान में छापेमारी कर 4 लोगों को गिरफ्तार किया गया।
गृह मंत्री मार्च 2029 तक पूर्ण नशा-मुक्ति के संकल्प को पूरा करने के लिए पूरे देश में नार्को को ऑर्डिनेशन सेंटर की संख्या 334 से बढ़ाकर 1,751 करने जा रहे है। पंजाब के लोगों को जाग्रत करने के लिए बीजेपी ने नशा मुक्त पंजाब की यात्राएं' शुरू की हैं। यह अभियान 30 सितंबर को जालंधर में समाप्त होगा, जहां खुद गृह मंत्री लोगों को संबोधित कर सकते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)