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निराशा-असफलता को पीछे छोड़कर कौन बढ़ते हैं आगे

प्रकाशित: 16-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
विवेक शुक्ला
आपको दिल्ली, मुंबई और देश के बड़े शहरों और महानगरों में इस तरह के हजारों लोग मिल जाएंगे जो हर रोज अपने घर से दफ्तर और फिर वापसी के सफर में 4-5 घंटे लगा देते हैं। जाहिर है, इससे उनकी पूरी पर्सनेल्टी पर असर पड़ना लाजिमी है। इस लंबी यात्रा में समय ही नहीं, ऊर्जा और धैर्य भी खत्म हो जाता है। घर पहुंचते-पहुंचते व्यक्ति इतना थक चुका होता है कि परिवार से बात करने या बच्चों के साथ बैठने का मन नहीं रहता।
मेट्रो या बस में फोन पॉल करने से मानसिक थकान और बढ़ जाती है। यात्रा के दौरान गहरी सांस लेना, हल्की संगीत सुनना या खिड़की से बाहर देखना छोटे लेकिन असरदार उपाय हो सकते हैं। इस तरह की भागदौड़ भरी जिंदगी में खुशी के पल खोजना कभी-कभी मुश्किल लगता है, लेकिन असंभव नहीं।
सुबह अलार्म बजते ही दौड़ शुरू हो जाती है। ऑफिस की मीटिंग, ट्रैफिक जाम, घर के काम, बच्चों की पढ़ाई, सोशल मीडिया की तुलना और रात को नींद न आना। यह सब तनाव का कारण बन जाता है।
तनाव की वजह अनेक हैं। काम का दबाव, आर्थिक चिंता, रिश्तों में खटास, स्वास्थ्य समस्याएं और भविष्य की अनिश्चितता सबसे बड़े कारण हैं। शहरों में भागदौड़ और गांवों में बदलती अपेक्षाएं दोनों जगह मानसिक बोझ बढ़ा रही हैं।
असफलता के बाद भी आगे बढ़ने के कई प्रेरणादायक उदाहरण हैं। थॉमस एडिसन ने बल्ब बनाने से पहले हजारों प्रयोग किए जो असफल रहे, फिर भी उन्होंने कहा कि वे हारे नहीं, बस ऐसे तरीके खोजे जो काम नहीं करते। महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका में अपमान सहकर भी अहिंसा का मार्ग नहीं छोड़ा। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम कई परियोजनाओं की चुनौतियों के बावजूद मिसाइल मैन बने। अमिताभ बच्चन फ्लॉप फिल्मों के बाद भी संघर्ष करते रहे और सुपरस्टार बने। ये लोग निराश नहीं हुए, सीखकर आगे बढ़े और खुश रहे।
तनाव सिर्फ दिमाग तक सीमित नहीं रहता। यह शरीर को भी प्रभावित करता है। सिरदर्द, थकान, चिड़चिड़ापन और नींद की कमी आम शिकायतें बन गई हैं। कई लोग सोचते हैं कि बड़ी सफलता या छुट्टी पर जाने से खुशी आएगी, लेकिन अनुभव बताता है कि खुशी बड़े आयोजनों में नहीं, छोटे-छोटे पलों में छिपी होती है। चाय की प्याली में सुकून, बच्चे की हंसी, दोस्त से छोटी बातचीत या शाम की सैर। ये पल जीवन को हल्का बनाते हैं। भीड़भरे महानगरों में पार्क की दस मिनट की सैर, बालकनी के पौधे देखना या परिवार के साथ मिलकर सादा खाना बनाना भी मन को शांत कर सकता है।
खुशी के इन पलों को पहचानने के लिए सबसे पहले जागरूकता जरूरी है। हम अक्सर भविष्य की चिंता या अतीत के पछतावे में वर्तमान खो देते हैं।
वर्तमान में जीना सीखें। सुबह पांच मिनट चुपचाप बैठकर सांस पर ध्यान देना तनाव कम करता है। दिन भर में तीन चीजों के लिए आभार व्यक्त करना मन को सकारात्मक रखता है। छोटे लक्ष्य तय करें और उन्हें पूरा होने पर खुद को सराहें।
रिश्ते खुशी का बड़ा स्रोत हैं। परिवार के साथ बिना फोन के समय बिताना, दोस्तों से मुलाकात या पड़ोसी से मुस्कान भरा अभिवादन दिल को हल्का करता है। अकेलेपन की भावना तनाव बढ़ाती है, इसलिए सार्थक संवाद बनाए रखें। काम और जीवन के बीच संतुलन भी जरूरी है। ऑफिस से घर आकर काम की बातें न दोहराएं। सीमा तय करें।
शरीर की देखभाल भी मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी है। नियमित टहलना, योग या हल्की कसरत तनाव हार्मोन को कम करती है। सही भोजन और पर्याप्त नींद ऊर्जा बनाए रखते हैं। सोशल मीडिया का सीमित उपयोग तुलना की भावना घटाता है। दूसरों की जिंदगी देखकर अपनी जिंदगी नापना बंद करें।
हाल ही में मशहूर लेखक और टीवी पर्सनैलिटी उज्जवल त्रिवेदी ने इसी विषय पर महत्वपूर्ण किताब लिखी है। उनकी पुस्तक 99 स्टेपस टू हैप्पीनेस मनोविज्ञान, आध्यात्मिकता और रोजमर्रा के जीवन से लिए गए 99 व्यावहारिक सबक प्रस्तुत करती है। लाखों दर्शकों से जुड़ने के बाद उज्जवल त्रिवेदी ने भीतर झांककर यह जाना कि सच्ची खुशी बाहर नहीं, अंदर मिलती है।
वे मानते हैं कि खुशी कोई बड़ी खोज नहीं, रोज का अभ्यास है। किताब में आत्मचिंतन के प्रश्न हैं जो पाठक को अपनी आदतों पर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। एक कदम आंतरिक बच्चे को जीवित रखने की बात करता है, दूसरा सहानुभूति विकसित करने की। ये छोटे बदलाव धीरे-धीरे जीवन को हल्का और उद्देश्यपूर्ण बनाते हैं। हृदय विदारक अनुभव, अर्थ की खोज या शांत मन चाहने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह किताब साथ चलती है। एक कदम, हर दिन, ज्यादा खुश जीवन की ओर।
विशेषज्ञ मानते हैं कि हम रोज कोई ध्यान करे, कोई प्रकृति में समय बिताए। महत्वपूर्ण यह है कि हम खुशी को भविष्य की घटना से न जोड़ें। आज ही के छोटे पलों को महत्व दें। तनाव पूरी तरह खत्म नहीं होगा, लेकिन उसका प्रभाव कम किया जा सकता है।
जीवन में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं। सफलता और असफलता दोनों आएंगी। खुशी इस बात में है कि हम उनसे कैसे निपटते हैं। लचीलापन विकसित करें। गलतियों से सीखें और आगे बढ़ें। दूसरों की मदद करना भी खुशी बढ़ाता है। छोटी दयालुता का बड़ा प्रभाव होता है।
खुशी कोई मंजिल नहीं, यात्रा है। आज की भागदौड़ में रुककर सांस लेने की हिम्मत रखें। हम हर दिन एक छोटा कदम उठा सकते हैं। तनाव के कारण चाहे कितने भी हों, खुशी के पल हमारे आसपास ही बिखरे हैं। उन्हें पहचानें, संजोएं और बांटें। यही संतुलित और संतुष्ट जीवन का आधार है। छोटे-छोटे बदलाव बड़ी शांति ला सकते हैं। आज से ही शुरू करें।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)