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ब्रिक्स में भारत का कूटनीतिक कमाल: मतभेदों में सहमति की मिसाल

प्रकाशित: 15-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
प्रशांत कुमार
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में साझा घोषणापत्र पर आम सहमति बनना भारत के लिए केवल सफल मेजबानी का प्रमाण नहीं है। यह उस कूटनीतिक क्षमता का प्रदर्शन है, जिसकी बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में आज सबसे अधिक जरूरत है। विरोधी हितों के बीच संवाद बनाए रखना, मतभेदों को टकराव में बदलने से रोकना और असहमति के बीच साझा रास्ता तलाशना।
घोषणापत्र पर सहमति ऐसे समय बनी, जब पश्चिम एशिया का संकट ब्रिक्स के भीतर भी मतभेद पैदा कर रहा था। ईरान और संयुक्त अरब अमीरात की प्राथमिकताएं अलग थीं और मसौदे की भाषा पर आखिरी क्षण तक बातचीत चलती रही। ईरान पर हुए हमलों के संदर्भ में अमेरिका का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं किया गया। इसके बजाय घोषणापत्र में संयम, संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता, अंतर्राष्ट्रीय कानून और संवाद जैसे व्यापक सिद्धांतों को आधार बनाया गया। यही इस दस्तावेज की सबसे बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है। भारत ने दिखाया कि कूटनीति का अर्थ केवल अपनी बात मनवाना नहीं, बल्कि ऐसी सहमति तैयार करना भी है, जिसे अलग-अलग हितों वाले देश स्वीकार कर सकें।
भारत ने इस सम्मेलन के जरिए यह संकेत दिया है कि वह ब्रिक्स का महज एक सदस्य या मेजबान देश नहीं, बल्कि विभिन्न शक्ति-केंद्रों के बीच संवाद और सहमति का प्रभावी सूत्रधार भी बन सकता है। ब्रिक्स जैसे विविधतापूर्ण समूह में यह भूमिका आसान नहीं है। सदस्य देशों के राजनीतिक हित, सुरक्षा प्राथमिकताएं और आर्थिक लक्ष्य कई बार एक-दूसरे से टकराते हैं। समूह की आम सहमति पर आधारित निर्णय प्रक्रिया में किसी एक सदस्य की आपत्ति भी सामूहिक बयान को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में भारत के सामने चुनौती किसी एक पक्ष को जीत दिलाने की नहीं, बल्कि ऐसी भाषा तैयार करने की थी, जिसमें सभी पक्ष अपने हितों की पर्याप्त जगह देख सकें। पश्चिम एशिया के मुद्दे पर घोषणापत्र ने इसी संतुलन का परिचय दिया। उसने न तो किसी एक पक्ष की भाषा को पूरी तरह अपनाया और न ही संकट की अनदेखी की। बातचीत और कूटनीति को समाधान का रास्ता बताया गया। नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा पर जोर दिया गया। साथ ही व्यापार, ऊर्जा और आपूर्ति श्रं= खलाओं के निर्बाध प्रवाह को अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुरूप बनाए रखने की जरूरत को रेखांकित किया गया।
यह संतुलन भारत की विदेश नीति की मूल भावना से मेल खाता है। अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ उसके संबंध गहरे हो रहे हैं, रूस के साथ पुराने रणनीतिक रिश्ते हैं, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और संवाद दोनों हैं। ईरान और खाड़ी देशों के साथ महत्वपूर्ण आर्थिक और सामरिक हित जुड़े हैं। ऐसे माहौल में भारत के लिए किसी एक धड़े का हिस्सा बनने के बजाय सभी प्रमुख शक्ति-केंद्रों के साथ अपने हितों के अनुरूप संबंध बनाए रखना आवश्यक है। रणनीतिक स्वायत्तता का यही व्यावहारिक अर्थ है- दबावों के बीच अपने विकल्प खुले रखना और जरूरत के मुताबिक अलग-अलग साझेदारियों को आगे बढ़ाना।
घोषणापत्र का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू आतंकवाद से जुड़ा है। ब्रिक्स ने आतंकवाद के खिलाफ शून्य-सहिष्णुता की नीति और दोहरे मानदंडों से बचने की आवश्यकता पर जोर दिया। आतंकियों की सीमा पार आवाजाही, आतंकवाद के वित्तपोषण और सुरक्षित पनाहगाहों के खिलाफ कार्रवाई का उल्लेख भारत के लिए विशेष महत्व रखता है। 22 अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले की कड़े शब्दों में निंदा को घोषणापत्र में जगह मिलना भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है। इस हमले में 26 लोगों की जान गई थी। इतने महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच पर इस घटना का उल्लेख भारत को अपने सुरक्षा सरोकारों और आतंकवाद के खिलाफ लंबे समय से उठाए जा रहे सवालों को व्यापक अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ में रखने का अवसर देता है। भारत लगातार यह रेखांकित करता रहा है कि आतंकवाद को राजनीतिक सुविधा या भौगोलिक सीमा के आधार पर अलग-अलग नजरिए से नहीं देखा जा सकता। आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई में दोहरे मानदंड की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। घोषणापत्र की भाषा इस दृष्टिकोण के करीब दिखाई देती है। हालांकि, राजनीतिक सहमति को ठोस सुरक्षा सहयोग में बदलना अगली बड़ी चुनौती होगी। खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, आतंकवाद के वित्तपोषण पर रोक, सीमा पार आतंकी नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई और सुरक्षित पनाहगाहों पर दबाव जैसे क्षेत्रों में ब्रिक्स को व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। सिर्फ निंदा और संकल्प पर्याप्त नहीं होंगे। आतंकवाद के खिलाफ किसी भी सामूहिक मंच की विश्वसनीयता उसकी कार्रवाई से तय होती है।
घोषणापत्र का व्यापार संबंधी पक्ष भी रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। ब्रिक्स ने विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप नहीं होने वाले एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क उपायों पर चिंता जताई है। वैश्विक अर्थव्यवस्था जब संरक्षणवाद, शुल्क युद्ध और आपूर्ति शृंखलाओं के पुनर्गठन से गुजर रही हो, तब यह रुख खासा मायने रखता है। भारत के लिए यह केवल आर्थिक नीति का सवाल नहीं, बल्कि विकास और रणनीतिक हितों से जुड़ा विषय है। भारत वैश्विक बाजारों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना, विनिर्माण और निर्यात का विस्तार करना तथा विदेशी निवेश आकर्षित करना चाहता है। दूसरी ओर, बदलती व्यापार नीतियां, बढ़ती शुल्क बाधाएं और वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता उसके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रही हैं।
इस घोषणापत्र से ब्रिक्स को सबसे बड़ा संभावित लाभ उसकी विश्वसनीयता के रूप में मिल सकता है। अगर इतने विविध हितों वाला समूह पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील मुद्दे पर साझा भाषा विकसित कर सकता है, तो ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, वित्त, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक शासन सुधार जैसे विषयों पर भी सहयोग की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। लेकिन साझा घोषणाएं जारी करना और उन्हें जमीन पर उतारना दो अलग बातें हैं। घोषणापत्र तभी प्रभावी होंगे, जब उनके पीछे संस्थागत व्यवस्था, वित्तीय संसाधन, स्पष्ट कार्ययोजना और जवाबदेही का तंत्र मौजूद हो।
विस्तारित ब्रिक्स के सामने असली सवाल यही है कि क्या वह केवल पश्चिमी प्रभुत्व वाली वैश्विक व्यवस्था की आलोचना करने वाला मंच बनकर रह जाएगा या फिर वैकल्पिक आर्थिक और राजनीतिक सहयोग का प्रभावी केंद्र भी बन सकेगा? इसका उत्तर सम्मेलनों और बयानों से नहीं, बल्कि साझा परियोजनाओं, वित्तीय सहयोग, व्यापारिक सुविधा और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के लिए उठाए गए कदमों से मिलेगा।
नई दिल्ली घोषणापत्र ने इस भूमिका को और मजबूत करने का अवसर दिया है। भारत ने संकेत दिया है कि वह अलग-अलग मत रखने वाले देशों को एक साझा मंच पर ला सकता है और संवेदनशील मुद्दों पर ऐसी भाषा तैयार कर सकता है, जो टकराव के बजाय संवाद को बढ़ावा दे।
अब चुनौती इस उपलब्धि को स्थायी प्रभाव में बदलने की है। अगर भारत ब्रिक्स के भीतर आतंकवाद के खिलाफ सहयोग, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार सुगमता, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक दक्षिण की आवाज को ठोस पहलों से जोड़ पाता है, तो उसकी भूमिका केवल सम्मेलन आयोजित करने वाले देश की नहीं रहेगी। वह ब्रिक्स के एजेंडे को दिशा देने वाला और विभिन्न शक्ति-केंद्रों के बीच सेतु बनाने वाला देश बन सकता है।
नई दिल्ली घोषणापत्र की वास्तविक सफलता का फैसला आज की कूटनीतिक सहमति से नहीं, बल्कि कल की सामूहिक कार्रवाई से होगा। भारत ने संवाद का रास्ता तैयार किया है और सहमति की संभावना को साबित किया है। अब उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि यह सहमति केवल दस्तावेज के पन्नों तक सीमित न रह जाए। ब्रिक्स की ताकत उसकी विविधता में है, लेकिन यही विविधता उसकी कमजोरी भी बन सकती है। भारत के सामने अवसर है कि वह इस विविधता को मतभेदों का कारण नहीं, सहयोग की ताकत बनाए। आखिरकार, ब्रिक्स में भारत की कूटनीतिक जीत तभी स्थायी उपलब्धि बनेगी, जब सहमति की भाषा ठोस कार्रवाई की भाषा में बदल सकेगी।
(लेखक वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं।)