राजनीति के दंगल में धार्मिक तुष्टीकरण के दांव
प्रकाशित: 14-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डा. रवीन्द्र अरजरिया
बंगाल से लेकर दिल्ली तक दुर्गा पूजा पर मांसाहार के भक्षण पर बयानों, प्रदर्शनों और शब्द मंथन का दौर प्रारम्भ हो गया है। खान-पान, रहन-सहन और सोच-विचार के आधार पर देश को बांटने का प्रयास आक्रान्ताओं के आगमन के साथ ही शुरू हो गया था। चाटुकारों की लोलुप मानसिकता ने राष्ट्रभक्ति को दफन करके मीरजाफर की सोच को अंगीकार किया और भौतिक सुख की कल्पना में स्वयं के दुःखद अंत तक पहुंच गये। अतीत के पन्ने में चाटुकारों, लालचियों और स्वार्थी लोगों की कहानियां भरी पडीं हैं। सत्ता सुख, सम्मानित मंच और आर्थिक भण्डारण की मृगमारीचिका के पीछे दौडने वालों ने समय से साथ अवसरवादिता को अपनाया। कभी कट्टरता के आगे नतमस्तक हुए तो कभी शक्ति के आगे घुटने टेक दिये। कभी वैभव बटोरने के लिए नैतिकता की हत्या की तो कभी विलासता के लिए नीलामी के तख्ते पर खडे हो गये। ऐसे ही लोगों ने अपनों के छला और विरासत में मिलने वाली स्वयं की राष्ट्रीय थाथी को आतिताइयों के हाथों में पहुंचा दिया। संस्कृति, संस्कार और सनातन किस्तों में कत्ल होता चला गया। वैदिक परम्पराओं और मान्यताओं पर कुठाराघात होता चला गया। शान्त, सहज और सरल जीवन यापन करने वालों पर चन्द चालाकों ने शिकंजा कसा और शाश्वत सिद्धान्तों की मनमानी व्याख्यायें करके स्वयं भू संरक्षक बना बैठे। धर्म को छुईमुई का पौधा बनाकर रख दिया गया। अजर, अमर और अविनाशी धर्म को छुने, खाने, पहनने, बोलने, करने जैसी ािढयाओं से नष्ट होने की परिभाषायें दी जाने लगीं। विजातीय होने की घोषणायें होने लगी। परिणामस्वरूप सत्य पर असत्य का आवरण चढ़ता चला गया। देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप जीवन शैली अपनाने वालों ने नये परिवेश में भी अपनी मान्यताओं को रूढियों में बदलकर लकीर पीटना शुरू कर दिया। शासकों ने शासितों पर अपनी मान्यताओं को थोप दिया। लम्बे समय तक गुलामी झेलने के कारण आम आवाम का आत्मविश्वास तार-तार हो गया। यही कारण है कि स्वाधीनता संग्राम में आाढामकता को अंगीकार करने वालों के स्थान पर काले अंग्रेज बन चुके विलायती चाटुकारों के हाथों में षडयंत्र के तहत देश सौपा गया। नये तानाशाह का राजतिलक हुआ। बांटो और राज करो, की नीतियां चलती रहीं। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर बटवारे किये जाते रहे। सभी वर्गों के मीरजाफरों को पर्दे के पीछे से संरक्षण दिया जाता रहा। हालात यहां तक पहुंच गये कि तुष्टीकरण के लिए संविधान संशोधन भी किये जाते रहे ताकि अपने लोगों को खुश रखा जा सके। कभी न्याय के मापदण्ड बदले गये तो कभी धार्मिक सम्पत्तियों के लिए कठोर नियम बनाये। कभी पुरातन मान्यताओं को तोड़ा गया तो कभी आस्था पर आघात किया गया। स्वतंत्र भारत में ऐसे अनगिनत उदाहरण भरे पडे हैं जिनमें से शाहबानो प्रकरण तो आज देश की राजनीति से जवाब मांग रहा है। सन् 1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम प्रकरण में स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ तलाकशुदा महिला के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण के अधिकार को मान्यता दी। कोर्ट ने शाह बानो बेगम के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया जिससे कट्टरपंथी नाराज हो गये। रूढ़वादियों के तुष्टीकरण हेतु तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने सदन में 19 मई 1986 को मुस्लिम महिला अधिनियम पारित किया और देश की सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को निष्प्रभावी कर दिया। मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए वक्फ को मजबूत किया गया। वर्तमान में वक्फ बोर्ड के पास कुल 8.72 लाख से अधिक पंजीकृत अचल संपत्तियां, 16 हजार से अधिक चल संपत्तियां तथा 38 लाख एकड़ से अधिक भूमि है। ईसाइयों की धार्मिक संपत्तियों के लिए कैनन लॉ के नियम लागू होते हैं। वहीं हिन्दुओं के मंदिरों की सम्पत्तियों पर सरकारी कब्जे के फरमान जारी होते रहे। अधिकांश पर सरकारी कारिन्दों को प्रशासक बनाकर बैठा दिया गया जो सरकार के इशारे तथा स्वयं की मर्जी से व्यवस्थाओं संशोधित कर रहे हैं। इतिहास के पन्नों की कालिख के अलावा अब वर्तमान परिदृष्य बेहद कष्टप्रद होता जा रहा है। भगवां यात्रायें निकालने वाले हों या फिर हरे झंडे के नीचे धमकियां देने वाले। नीली जमात के सिपाहसालार हों या फिर सफेद टोपी वालों की भीड। लाल फीताशाही हो या फिर खद्दरधारियों की जमातें। समाज सेवक के लबादे में लिपटे षडयंत्रकारी हों या फिर बुद्धिजीवियों के स्वयं भू ठेकेदार। सभी एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत आम आवाम को ठगने, सत्ता सुख भोगने, विलासता के संसाधन जुटाने में लगे हैं। सनातन की सरलता ने उसे राजनैतिक दलों का चारागाह बना दिया है। बहुसंख्यक का नाम देकर उस पर अत्याचारों की दावानल निरंतर गिराया जा रहा है। जातिगत वैमनुष्यता फैलाई जा रही है। वैदिक मान्यताओं तक को हाशिये पर पहुंचाया जा रहा है। उदाहरण के लिए सनातनी ग्रन्थों में उल्लेखित चार धामों के विस्तार को लें तो वर्तमान में सरकारी तंत्र की गतिविधियों में छुपा षडयंत्र सामने आ ही जाता है। देश के वर्तमान मानचित्रानुसार उत्तराखण्ड में श्रीबद्रीनाथ धाम, उडीसा में श्रीजगन्नाथ धाम, तमिलनाडु में श्रीरामेश्वरम धाम तथा गुजरात में श्रीद्वारिका धाम की स्थिति ही चारों धाम की परिभाषा को पूर्ण करते हैं परन्तु उत्तराखण्ड की सरकारी मशानरी लम्बे समय से अपने राज्य में ही चारों धाम होने का जयघोष करके सनातनी ग्रन्थों को झूठा साबित करने पर तुली है। वहां के सरकारी आंकडों में श्रीबद्रीनाथ, श्रीकेदारनाथ, श्रीगंगोत्री और श्रीयमुनात्री ही चारों धाम हैं। ऐसा ही प्रयास कांग्रेस के शासन काल में श्रीरामसेतु की प्रमाणिकता के दौरान भी किया गया था जिसमें प्रमाणों को झुठलाकर उसे काल्पनिक तक बताया गया था। सूत्रों में समायोजित सनातनी ग्रन्थों ने अपने दर्शन को कथानकों के माध्यम से रोचकता प्रदान करते हुए वर्णित किया है जिसे तत्वदर्शियों, ज्ञानियों तथा तपस्वियों से ही उसका मर्म समझा जा सकता है। जैसे कहानी के कथानक, कथोपकथन आदि के पीछे उसकी शिक्षा छुपी होती है वैसे ही सनातनी ग्रन्थों की व्याख्या भी है। संस्कृत को हिन्दी में अनुवादित करने वालों ने अपनी समकालीन सामाजिक व्यवस्थाओं को भी धर्म के नाम पर परोस दिया था जिसे आज भी अनेक कथित विद्वानजन मान्यता के रास्ते से रूढि बनाने पर तुले हैं। अनेक अनुवाद तो देश की गुलामी के दौरान कराये गये। ग्रन्थों को आतिताई शासनों ने विकृत किया था। सामाजिक व्यवस्था को सुखद बनाने वाले आज स्वयं के हित साधने में लगे हैं। दलगत राजनीति के दिखावे के पीछे निजी हितों की लहरें छुपी हैं जो अब सुनामी बनकर देश को ही नस्तनाबूत करने पर तुल गईं हैं। बहुरूपिये बनकर खद्दरधारियों की जमातें चुनावी काल में मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वार पहुंचने लगते हैं। जातिगत महापुरुषों को देवता, भगवान और परमात्मा तक मानने लगते हैं। अभी से ही संख्याबल के आधार पर नये दावपेंच चले जा रहे हैं। ऐसे में देश को आम आवाम को स्वयं आगे आकर एक देश-एक कानून की मांग उठाना चाहिए तभी राजनीति के दंगल में धार्मिक तुष्टीकरण के दांव विफल होंगे।
बंगाल से लेकर दिल्ली तक दुर्गा पूजा पर मांसाहार के भक्षण पर बयानों, प्रदर्शनों और शब्द मंथन का दौर प्रारम्भ हो गया है। खान-पान, रहन-सहन और सोच-विचार के आधार पर देश को बांटने का प्रयास आक्रान्ताओं के आगमन के साथ ही शुरू हो गया था। चाटुकारों की लोलुप मानसिकता ने राष्ट्रभक्ति को दफन करके मीरजाफर की सोच को अंगीकार किया और भौतिक सुख की कल्पना में स्वयं के दुःखद अंत तक पहुंच गये। अतीत के पन्ने में चाटुकारों, लालचियों और स्वार्थी लोगों की कहानियां भरी पडीं हैं। सत्ता सुख, सम्मानित मंच और आर्थिक भण्डारण की मृगमारीचिका के पीछे दौडने वालों ने समय से साथ अवसरवादिता को अपनाया। कभी कट्टरता के आगे नतमस्तक हुए तो कभी शक्ति के आगे घुटने टेक दिये। कभी वैभव बटोरने के लिए नैतिकता की हत्या की तो कभी विलासता के लिए नीलामी के तख्ते पर खडे हो गये। ऐसे ही लोगों ने अपनों के छला और विरासत में मिलने वाली स्वयं की राष्ट्रीय थाथी को आतिताइयों के हाथों में पहुंचा दिया। संस्कृति, संस्कार और सनातन किस्तों में कत्ल होता चला गया। वैदिक परम्पराओं और मान्यताओं पर कुठाराघात होता चला गया। शान्त, सहज और सरल जीवन यापन करने वालों पर चन्द चालाकों ने शिकंजा कसा और शाश्वत सिद्धान्तों की मनमानी व्याख्यायें करके स्वयं भू संरक्षक बना बैठे। धर्म को छुईमुई का पौधा बनाकर रख दिया गया। अजर, अमर और अविनाशी धर्म को छुने, खाने, पहनने, बोलने, करने जैसी ािढयाओं से नष्ट होने की परिभाषायें दी जाने लगीं। विजातीय होने की घोषणायें होने लगी। परिणामस्वरूप सत्य पर असत्य का आवरण चढ़ता चला गया। देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप जीवन शैली अपनाने वालों ने नये परिवेश में भी अपनी मान्यताओं को रूढियों में बदलकर लकीर पीटना शुरू कर दिया। शासकों ने शासितों पर अपनी मान्यताओं को थोप दिया। लम्बे समय तक गुलामी झेलने के कारण आम आवाम का आत्मविश्वास तार-तार हो गया। यही कारण है कि स्वाधीनता संग्राम में आाढामकता को अंगीकार करने वालों के स्थान पर काले अंग्रेज बन चुके विलायती चाटुकारों के हाथों में षडयंत्र के तहत देश सौपा गया। नये तानाशाह का राजतिलक हुआ। बांटो और राज करो, की नीतियां चलती रहीं। धर्म के नाम पर, जाति के नाम पर, भाषा के नाम पर, क्षेत्र के नाम पर बटवारे किये जाते रहे। सभी वर्गों के मीरजाफरों को पर्दे के पीछे से संरक्षण दिया जाता रहा। हालात यहां तक पहुंच गये कि तुष्टीकरण के लिए संविधान संशोधन भी किये जाते रहे ताकि अपने लोगों को खुश रखा जा सके। कभी न्याय के मापदण्ड बदले गये तो कभी धार्मिक सम्पत्तियों के लिए कठोर नियम बनाये। कभी पुरातन मान्यताओं को तोड़ा गया तो कभी आस्था पर आघात किया गया। स्वतंत्र भारत में ऐसे अनगिनत उदाहरण भरे पडे हैं जिनमें से शाहबानो प्रकरण तो आज देश की राजनीति से जवाब मांग रहा है। सन् 1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने मोहम्मद अहमद खान बनाम शाहबानो बेगम प्रकरण में स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ तलाकशुदा महिला के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण के अधिकार को मान्यता दी। कोर्ट ने शाह बानो बेगम के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया जिससे कट्टरपंथी नाराज हो गये। रूढ़वादियों के तुष्टीकरण हेतु तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने सदन में 19 मई 1986 को मुस्लिम महिला अधिनियम पारित किया और देश की सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को निष्प्रभावी कर दिया। मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए वक्फ को मजबूत किया गया। वर्तमान में वक्फ बोर्ड के पास कुल 8.72 लाख से अधिक पंजीकृत अचल संपत्तियां, 16 हजार से अधिक चल संपत्तियां तथा 38 लाख एकड़ से अधिक भूमि है। ईसाइयों की धार्मिक संपत्तियों के लिए कैनन लॉ के नियम लागू होते हैं। वहीं हिन्दुओं के मंदिरों की सम्पत्तियों पर सरकारी कब्जे के फरमान जारी होते रहे। अधिकांश पर सरकारी कारिन्दों को प्रशासक बनाकर बैठा दिया गया जो सरकार के इशारे तथा स्वयं की मर्जी से व्यवस्थाओं संशोधित कर रहे हैं। इतिहास के पन्नों की कालिख के अलावा अब वर्तमान परिदृष्य बेहद कष्टप्रद होता जा रहा है। भगवां यात्रायें निकालने वाले हों या फिर हरे झंडे के नीचे धमकियां देने वाले। नीली जमात के सिपाहसालार हों या फिर सफेद टोपी वालों की भीड। लाल फीताशाही हो या फिर खद्दरधारियों की जमातें। समाज सेवक के लबादे में लिपटे षडयंत्रकारी हों या फिर बुद्धिजीवियों के स्वयं भू ठेकेदार। सभी एक सुनियोजित षडयंत्र के तहत आम आवाम को ठगने, सत्ता सुख भोगने, विलासता के संसाधन जुटाने में लगे हैं। सनातन की सरलता ने उसे राजनैतिक दलों का चारागाह बना दिया है। बहुसंख्यक का नाम देकर उस पर अत्याचारों की दावानल निरंतर गिराया जा रहा है। जातिगत वैमनुष्यता फैलाई जा रही है। वैदिक मान्यताओं तक को हाशिये पर पहुंचाया जा रहा है। उदाहरण के लिए सनातनी ग्रन्थों में उल्लेखित चार धामों के विस्तार को लें तो वर्तमान में सरकारी तंत्र की गतिविधियों में छुपा षडयंत्र सामने आ ही जाता है। देश के वर्तमान मानचित्रानुसार उत्तराखण्ड में श्रीबद्रीनाथ धाम, उडीसा में श्रीजगन्नाथ धाम, तमिलनाडु में श्रीरामेश्वरम धाम तथा गुजरात में श्रीद्वारिका धाम की स्थिति ही चारों धाम की परिभाषा को पूर्ण करते हैं परन्तु उत्तराखण्ड की सरकारी मशानरी लम्बे समय से अपने राज्य में ही चारों धाम होने का जयघोष करके सनातनी ग्रन्थों को झूठा साबित करने पर तुली है। वहां के सरकारी आंकडों में श्रीबद्रीनाथ, श्रीकेदारनाथ, श्रीगंगोत्री और श्रीयमुनात्री ही चारों धाम हैं। ऐसा ही प्रयास कांग्रेस के शासन काल में श्रीरामसेतु की प्रमाणिकता के दौरान भी किया गया था जिसमें प्रमाणों को झुठलाकर उसे काल्पनिक तक बताया गया था। सूत्रों में समायोजित सनातनी ग्रन्थों ने अपने दर्शन को कथानकों के माध्यम से रोचकता प्रदान करते हुए वर्णित किया है जिसे तत्वदर्शियों, ज्ञानियों तथा तपस्वियों से ही उसका मर्म समझा जा सकता है। जैसे कहानी के कथानक, कथोपकथन आदि के पीछे उसकी शिक्षा छुपी होती है वैसे ही सनातनी ग्रन्थों की व्याख्या भी है। संस्कृत को हिन्दी में अनुवादित करने वालों ने अपनी समकालीन सामाजिक व्यवस्थाओं को भी धर्म के नाम पर परोस दिया था जिसे आज भी अनेक कथित विद्वानजन मान्यता के रास्ते से रूढि बनाने पर तुले हैं। अनेक अनुवाद तो देश की गुलामी के दौरान कराये गये। ग्रन्थों को आतिताई शासनों ने विकृत किया था। सामाजिक व्यवस्था को सुखद बनाने वाले आज स्वयं के हित साधने में लगे हैं। दलगत राजनीति के दिखावे के पीछे निजी हितों की लहरें छुपी हैं जो अब सुनामी बनकर देश को ही नस्तनाबूत करने पर तुल गईं हैं। बहुरूपिये बनकर खद्दरधारियों की जमातें चुनावी काल में मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वार पहुंचने लगते हैं। जातिगत महापुरुषों को देवता, भगवान और परमात्मा तक मानने लगते हैं। अभी से ही संख्याबल के आधार पर नये दावपेंच चले जा रहे हैं। ऐसे में देश को आम आवाम को स्वयं आगे आकर एक देश-एक कानून की मांग उठाना चाहिए तभी राजनीति के दंगल में धार्मिक तुष्टीकरण के दांव विफल होंगे।