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समान नागरिक संहिता आखिर है क्या?

प्रकाशित: 22-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. ओंकार त्रिपाठी
समान नागरिक संहिता को लेकर देश में जितनी चर्चा है, उतनी ही धारणाएँ और आशंकाएँ भी हैं। कोई इसे समानता की दिशा में बड़ा कदम मानता है, तो कोई इसे धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखता है। ऐसे में सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि समान नागरिक संहिता आखिर है क्या और इसका संबंध आम नागरिक के जीवन से कैसे है? किसी कानून के विरोध से पहले उसके वास्तविक स्वरूप को समझना लोकतांत्रिक समाज की पहली आवश्यकता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य से अपेक्षा की गई है कि वह भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करे। यह संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में है, अर्थात यह अपने आप न्यायालय में लागू कराने योग्य मौलिक अधिकार नहीं है, लेकिन शासन के लिए संवैधानिक दिशा अवश्य निर्धारित करता है।
साधारण भाषा में समान नागरिक संहिता का अर्थ उन नागरिक और पारिवारिक मामलों में समान कानूनी व्यवस्था से है, जिनमें वर्तमान में विभिन्न समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत कानून या प्रथाएँ लागू हैं। विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति और कुछ मामलों में दत्तक संतान ग्रहण करने जैसे विषय भी इसके दायरे में आते हैं। इसका मूल प्रश्न यह है कि नागरिक की धार्मिक पहचान अलग हो सकती है, लेकिन उसके नागरिक अधिकार और कानूनी संरक्षण में समानता का सिद्धांत किस सीमा तक लागू होगा।
यहीं एक महत्वपूर्ण भ्रम दूर करना जरूरी है। समान नागरिक संहिता का अर्थ धर्म की एकरूपता नहीं है। भारत में हर व्यक्ति को अपनी आस्था मानने, धार्मिक उपासना करने और अपने धार्मिक विश्वासों का पालन करने की स्वतंत्रता संविधान देता है।मंदिर में पूजा कैसे होगी, मस्जिद में नमाज कैसे पढ़ी जाएगी, गुरुद्वारे में परंपराएँ क्या होंगी या चर्च में प्रार्थना किस विधि से होगी, इन प्रश्नों का उत्तर समान नागरिक संहिता नहीं देती। धार्मिक पर्व, धार्मिक यात्राएँ और पूजा-पद्धतियाँ भी अपने-अपने विश्वासों के अनुसार चल सकती हैं। संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जबकि नागरिक कानून नागरिकों के पारस्परिक अधिकारों और दायित्वों को निर्धारित करता है। दोनों को एक ही विषय मान लेना बहस को अनावश्यक रूप से उलझाना है।
इसका अर्थ यह भी नहीं कि विविधता समाप्त हो जाएगी। भारत की सांस्कृतिक विविधता उसकी शक्ति है। अलग-अलग समुदाय अपनी विवाह-परंपराएँ और सांस्कृतिक रीति-रिवाज निभा सकते हैं, बशर्ते कानून द्वारा निर्धारित नागरिक अधिकार और दायित्व स्पष्ट हों। विवाह का धार्मिक संस्कार अलग हो सकता है, लेकिन विवाह के बाद पति-पत्नी के अधिकार, तलाक की कानूनी प्रक्रिया, भरण-पोषण, संतान के अधिकार और संपत्ति के प्रश्नों पर कानून के सामने समानता का सवाल उठना स्वाभाविक है। समानता का अर्थ यह नहीं कि सबकी संस्कृति एक जैसी हो जाए। इसका अर्थ यह है कि नागरिक अधिकारों का आधार केवल धार्मिक पहचान न हो।
महिलाओं के अधिकार का प्रश्न इस पूरी बहस का महत्वपूर्ण पक्ष है। विवाह, तलाक, भरण-पोषण, संपत्ति और उत्तराधिकार के नियम किसी महिला के सामाजिक और आर्थिक जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं। इसलिए समान नागरिक संहिता पर चर्चा केवल धार्मिक पहचान की बहस बनाकर छोड़ देना अधूरा दृष्टिकोण होगा। किसी भी प्रस्तावित कानून को इस कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए कि वह महिलाओं, बच्चों और परिवार के प्रत्येक सदस्य को किस प्रकार के अधिकार और संरक्षण देता है।
विरोध करने वाले धार्मिक संगठनों की चिंताओं को भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सुना जाना चाहिए। किसी संगठन को कानून का विरोध करने, अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने का अधिकार है।
हाल में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता के विरोध में तीन महीने के राष्ट्रव्यापी अभियान की घोषणा की है। बोर्ड ने इसे संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता और मुस्लिम व्यक्तिगत कानून से जुड़े अधिकारों के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया है।
लेकिन किसी भी आंदोलन की व्यापकता अपने आप उसके पक्ष की संवैधानिक या कानूनी शुद्धता सिद्ध नहीं करती। इसी प्रकार केवल यह कह देना कि किसी कानून से धर्म खतरे में है, पर्याप्त नहीं होना चाहिए।
वास्तविक लोकतांत्रिक बहस यह पूछे कि कानून की कौन-सी धारा आपत्तिजनक है, उसका व्यावहारिक प्रभाव क्या होगा और उसके विरोध का संवैधानिक या कानूनी आधार क्या है। यदि आपत्ति ठोस है तो उसका समाधान भी तर्क और संवाद से खोजा जाना चाहिए।
यही कसौटी राजनीतिक दलों पर भी लागू होनी चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह कानून की आवश्यकता, प्रावधान और संभावित प्रभाव जनता के सामने स्पष्ट करे।
विपक्ष का दायित्व है कि वह केवल विरोध न करे, बल्कि संसद में उसपर चर्चा करे, जिस प्रावधान पर आपत्ति है उसे स्पष्ट करे और आवश्यकता हो तो वैकल्पिक व्यवस्था भी सामने रखे। नागरिकों को भी कानून का समर्थन या विरोध केवल इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि उसे कौन-सी राजनीतिक पार्टी लेकर आई है। कानून की उपयोगिता और उसके प्रभाव को उसके प्रावधानों के आधार पर समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू होने के बाद यह बहस केवल सैद्धांतिक नहीं रह गई है। उत्तराखंड का कानून विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संबंधित विषयों को विनियमित करता है तथा उसके नियमों के अंतर्गत इन मामलों की प्रािढयाएँ निर्धारित की गई हैं। यह पूरे देश के लिए स्वत अंतिम मॉडल नहीं है, लेकिन इससे यह अवश्य समझा जा सकता है कि ऐसी व्यवस्था व्यवहार में किन प्रश्नों को जन्म देती है और प्रशासन को किन व्यवस्थाओं की आवश्यकता पड़ती है।
सबसे बड़ी कमी आज कानून से अधिक उसकी जानकारी को लेकर दिखाई देती है। आम मजदूर, किसान, दुकानदार, कर्मचारी या छोटा व्यवसायी दिन-रात कानूनी बहस नहीं सुन सकता। वह यह जानना चाहता है कि उसके परिवार, उसकी पत्नी, उसके बच्चों और उसकी संपत्ति पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा। केवल अखबारों में खबरें छप जाने या टेलीविजन पर राजनीतिक बहसें हो जाने से व्यापक जन समझ नहीं बनती।
इसलिए यदि समान नागरिक संहिता देशव्यापी विषय बन रही है तो सरकार को भी देशव्यापी जन-जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। गाँवों की चौपालों और पंचायतों में संवाद हों। स्थानीय भाषाओं में सरल पुस्तिकाएँ बाँटी जाएँ। रेडियो, दूरदर्शन और डिजिटल माध्यमों पर छोटे-छोटे स्पष्ट कार्यक्रम चलें। शहरों और गाँवों में होर्डिंग लगें, जिन पर सबसे पहले लिखा हो, ‘समान नागरिक संहिता क्या है?' और उसके नीचे सरल शब्दों में बताया जाए कि यह किन नागरिक विषयों से संबंधित है और किन धार्मिक स्वतंत्रताओं को इससे प्रभावित नहीं माना जाना चाहिए।
कानून संसद बनाएगी, सरकार उसे लागू करेगी और उसकी संवैधानिकता की अंतिम कसौटी न्यायपालिका के सामने होगी, लेकिन किसी कानून की वास्तविक सफलता केवल उसके पारित हो जाने से तय नहीं होती। समाज उसे कितना समझता है, उसके प्रति कितना विश्वास रखता है और उसके अनुसार कितना सहज व्यवहार करता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डंडे से कानून का पालन कराया जा सकता है, विश्वास पैदा नहीं किया जा सकता।
समान नागरिक संहिता की बहस को धर्म बनाम धर्म, बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक या सरकार बनाम विपक्ष की बहस बनाने के बजाय नागरिक अधिकार बनाम नागरिक अधिकार की कसौटी पर देखा जाना चाहिए। आस्था व्यक्ति की अपनी हो सकती है, उपासना की पद्धति अलग हो सकती है, संस्कृति की विविधता बनी रह सकती है, लेकिन कानून के सामने नागरिक की गरिमा और अधिकारों का प्रश्न समान होना चाहिए। यही वह बिंदु है जहाँ समान नागरिक संहिता की वास्तविक बहस शुरू होती है। जनता को नारे नहीं, कानून समझना चाहिए। सरकार को कानून के साथ उसकी भाषा भी सरल करनी चाहिए और लोकतंत्र को निर्णय से पहले संवाद का अवसर देना चाहिए। आखिर किसी भी कानून की सबसे बड़ी परीक्षा कागज पर नहीं, नागरिक के जीवन में होती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)