वर्षों से राष्ट्र की सेवा में समर्पित Virarjun अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वे, न दैन्यं, न पलायनम् ।

हिंदी दिवस : राजभाषा का उत्सव या अंग्रेजी की निरंतरता?

प्रकाशित: 15-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
डॉ. ओंकार त्रिपाठी
14 सितंबर आते ही देश में हिंदी का मौसम आ जाता है। सरकारी कार्यालयों में हिंदी पखवाड़े की चहल-पहल बढ़ जाती है। प्रतियोगिताएं होती हैं, निबंध लिखे जाते हैं, कविताएं पढ़ी जाती हैं, पुरस्कार बांटे जाते हैं और हिंदी के गौरव पर भाषण दिए जाते हैं। हिंदी को राष्ट्र की आत्मा, जन-जन की भाषा और भारतीय संस्कृति की संवाहिका बताया जाता है। और उस समय भी दफ्तर में काम अंग्रेजी भाषा में बदस्तूर चल रहा होता है, जिसे हिंदी दिवस के मंच से हटाने की कोई बात नहीं कही जाती। सवाल यही है कि यदि हिंदी वास्तव में राजभाषा है तो उसे राजकाज की भाषा बनने के लिए हर वर्ष एक दिन की अनुमति क्यों चाहिए?
संविधान ने हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया था। उस निर्णय के पीछे अंग्रेजी के प्रति विरोध नहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत के शासन को भारतीय भाषाई परिवेश से जोड़ने की आकांक्षा थी। उद्देश्य यह था कि शासन और जनता के बीच भाषा की दूरी कम हो तथा धीरे-धीरे सरकारी कामकाज में हिंदी का प्रयोग बढ़े। आज संविधान द्वारा निर्धारित दिशा के सामने सात दशक से अधिक का अनुभव है। इसलिए यह पूछना असंगत नहीं होगा कि हम लक्ष्य तक पहुंचे कितने और लक्ष्य की ओर बढ़े कितने?
स्वतंत्रता के बाद की पीढ़ी को याद होगा कि तब शिक्षा का माध्यम हिंदी हुआ करता था और अंग्रेजी एक विषय के रूप में पढ़ी जाती थी। अंग्रेजी सीखना आवश्यक और उपयोगी माना जाता था, लेकिन उसे जीवन में आगे बढ़ने की अनिवार्य शर्त नहीं समझा जाता था। फिर रोजगार की दुनिया बदली। निजी क्षेत्र बढ़ा, बहुराष्ट्रीय कंपनियां आईं, वैश्विक बाजार खुला और अंग्रेजी रोजगार की प्रमुख भाषा बनती चली गई। परिणाम यह हुआ कि शिक्षा भी रोजगार के पीछे चल पड़ी। आज बड़े निजी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम लगभग प्रतिष्ठा और भविष्य की गारंटी का पर्याय बन गया है।
हिंदी वहां एक विषय बनकर रह गई। कई बार तो ऐसा लगता है कि उसे पढ़ाया जाना भी केवल इसलिए आवश्यक है क्योंकि व्यवस्था में उसका प्रावधान है। विद्यार्थियों की ओर से समय-समय पर यह शिकायत भी सामने आती रही है कि कुछ निजी विद्यालयों में हिंदी बोलने पर जुर्माना तक लगाया जाता है। यदि यह स्थिति आज भी कहीं बनी हुई है तो यह केवल हिंदी की उपेक्षा नहीं, बल्कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था की मानसिकता पर गंभीर प्रश्न है। अंग्रेजी सीखना आधुनिकता हो सकता है, लेकिन अपनी भाषा बोलने पर दंड देना किस आधुनिकता का परिचायक है?
असल समस्या यह है कि हमने हिंदी को सम्मान तो दिया, पर अवसर नहीं दिया। हिंदी में भाषण देना गौरव की बात है, लेकिन हिंदी में विज्ञान पढ़ना कठिन माना जाता है। हिंदी में कविता लिखना प्रशंसनीय है, लेकिन हिंदी में तकनीकी शिक्षा लेना अभी भी कई लोगों को जोखिम भरा लगता है। हिंदी में साहित्य पढ़ना सांस्कृतिक दायित्व है, लेकिन नौकरी के आवेदन से लेकर साक्षात्कार तक अंग्रेजी को अधिक प्रभावशाली माना जाता है। जिस भाषा को रोजगार से नहीं जोड़ा जाएगा, वह युवा पीढ़ी की प्राथमिक भाषा कैसे बनेगी?
तकनीक ने इस चुनौती को और बड़ा कर दिया है। कंप्यूटर से लेकर इंटरनेट तक और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक अंग्रेजी की मजबूत उपस्थिति है। निश्चित रूप से हिंदी के लिए डिजिटल सामग्री, अनुवाद और तकनीकी सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन अभी लंबी दूरी तय करनी है। आने वाला समय भाषाओं के अस्तित्व का नहीं, उनकी तकनीकी क्षमता का भी समय है। जो भाषा डिजिटल दुनिया में सहजता से काम कर सकेगी, वही नई पीढ़ी के व्यवहार में जीवित और प्रभावशाली रहेगी। इसलिए हिंदी के भविष्य की लड़ाई केवल हिंदी विभागों और राजभाषा अधिकारियों के भरोसे नहीं लड़ी जा सकती।
सबसे बड़ी विडंबना केंद्र सरकार के कार्यालयों में दिखाई देती है। कार्यालयों में हिंदी के प्रयोग के लिए नियम हैं, लक्ष्य हैं, निरीक्षण हैं और पुरस्कार भी हैं, लेकिन महत्वपूर्ण प्रशासनिक कामकाज में अंग्रेजी का पूरा वर्चस्व है। सामान्य बातचीत हिंदी में हो सकती है, किंतु जैसे ही कोई महत्वपूर्ण बैठक शुरू होती है, नीति या निर्णय पर गंभीर चर्चा होती है, प्रस्तुति बनती है या उच्चस्तरीय प्रशासनिक संवाद होता है, अंग्रेजी को ही अधिक सुविधाजनक और शायद अधिक गरिमापूर्ण समझ लिया जाता है। हिंदी दिवस पर भी यदि कार्यालय का वास्तविक काम अंग्रेजी में ही चलता रहे तो फिर हिंदी दिवस मनाने का आशय क्या रह जाता है?
सरकारी व्यवस्था ने हिंदी के प्रयोग को कई बार आंकड़ों का खेल भी बना दिया है। फाइल पर नाम हिंदी में लिख दिया गया, कार्यालय के बाहर हिंदी की पट्टिका लगा दी गई, कुछ पत्र हिंदी में जारी कर दिए गए और मान लिया गया कि विभाजित कार्य राजभाषा में किया जा रहा है। भाषा फाइल के शीर्षक में नहीं, निर्णय की भाषा में दिखाई देती है। हिंदी में नाम लिख देने से हिंदी में काम नहीं होता। काम तब होता है जब अधिकारी अपनी टिप्पणी हिंदी में लिखे, बैठक में हिंदी में विचार रखे, निर्णय हिंदी में दर्ज हो और नागरिक को उसकी भाषा में सरकारी उत्तर मिले।
संसद का उदाहरण अवश्य उत्साह देता है। वहाँ अनेक सांसद हिंदी में प्रभावशाली ढंग से अपनी बात रखते हैं। सरकार के स्तर पर भी हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने के प्रयास होते हैं। लेकिन संसद में हिंदी की आवाज और प्रशासनिक कार्यालयों की कार्यभाषा के बीच जो अंतर दिखाई देता है, वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जनता के प्रतिनिधि जिस भाषा में जनता से संवाद करते हैं, प्रशासन उसी भाषा में निर्णय लेने में उतना सहज क्यों नहीं दिखाई देता?
प्रतियोगी परीक्षाओं की स्थिति भी हमारी भाषाई व्यवस्था की वास्तविक तस्वीर सामने रखती है। भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने का विकल्प मौजूद है, लेकिन उच्च शिक्षा, अध्ययन सामग्री और प्रतियोगी तैयारी के बड़े क्षेत्र में अंग्रेजी की मजबूत पकड़ बनी हुई है। सिविल सेवा जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में हिंदी माध्यम से चयनित अभ्यर्थियों की संख्या को लेकर समय-समय पर चिंता व्यक्त की जाती रही है। प्रतिभा किसी भाषा की बपौती नहीं होती। यदि समान प्रतिभा वाला विद्यार्थी केवल भाषा के कारण पीछे रह जाता है तो यह हिंदी का ही नहीं, समान अवसर का प्रश्न भी है। न्यायपालिका में अंग्रेजी का प्रभुत्व भी इसी बहस का महत्वपूर्ण पक्ष है। उच्चतम न्यायालय के कामकाज में अंग्रेजी की केंद्रीय भूमिका बनी हुई है। कानून और न्याय की अपनी जटिल शब्दावली है, देश की भाषाई विविधता भी एक बड़ी चुनौती है, लेकिन इसका समाधान यह नहीं हो सकता कि सामान्य नागरिक और न्याय की भाषा के बीच दूरी हमेशा बनी रहे। भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण न्यायिक अनुवाद और विधिक शब्दावली विकसित करना समय की आवश्यकता है।
मीडिया का क्षेत्र भी कम दिलचस्प नहीं है। हिंदी का विशाल पाठक और दर्शक वर्ग है। हिंदी के समाचार माध्यमों की पहुंच देश के दूर-दराज के क्षेत्रों तक है, फिर भी नीति, अर्थव्यवस्था, कॉरपोरेट जगत, उच्च शिक्षा और अभिजात्य विमर्श में अंग्रेजी का प्रभाव बहुत मजबूत है। बाजार वहीं जाता है जहां अवसर दिखाई देते हैं। इसलिए हिंदी को केवल भावनात्मक सम्मान नहीं, आर्थिक और व्यावसायिक उपयोगिता भी अर्जित करनी होगी।
यहां प्रश्न अंग्रेजी को हटाने का नहीं है। अंग्रेजी ज्ञान की एक महत्वपूर्ण खिड़की है और वैश्विक संपर्क की उपयोगी भाषा है। समस्या तब पैदा होती है जब खिड़की को ही घर का दरवाजा मान लिया जाए। भारत के बच्चे अंग्रेजी सीखें, दुनिया का ज्ञान प्राप्त करें और वैश्विक मंच पर जाएं, इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लेकिन अपनी भाषा में पढ़ने वाला विद्यार्थी अपने ही देश में कमतर समझा जाए, यह स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
हिंदी को वास्तविक राजभाषा बनाना है तो नीति का केंद्र बदलना होगा। हिंदी दिवस, हिंदी सप्ताह और हिंदी पखवाड़े से आगे बढ़कर हिंदी को रोजगार, उच्च शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, प्रशासन और न्याय से जोड़ना होगा। उच्च गुणवत्ता की पाठ्य सामग्री तैयार करनी होगी। वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली को सरल और व्यवहारिक बनाना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक में हिंदी की क्षमता बढ़ानी होगी। सरकारी कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग आंकड़ों और औपचारिकताओं से निकालकर निर्णय-प्रक्रिया तक पहुँचाना होगा।
राजभाषा का अर्थ यह नहीं कि अंग्रेजी को बाहर कर दिया जाए। राजभाषा का अर्थ यह है कि हिंदी को उसके घोषित दायित्व के अनुरूप काम करने का अवसर मिले। आज आवश्यकता भाषा के आधार पर किसी संघर्ष की नहीं, भाषाई आत्मविश्वास की है।
हिंदी दिवस पर सबसे बड़ा प्रश्न यही होना चाहिए कि अगले 14 सितंबर तक हमने हिंदी में कितना काम किया।
फाइल पर हिंदी में नाम लिखने से लेकर कार्यालय में हिंदी में निर्णय लेने तक की दूरी अभी भी बहुत लंबी है। जब तक यह दूरी समाप्त नहीं होती, तब तक हिंदी दिवस एक उत्सव तो रहेगा, लेकिन राजभाषा हिंदी का लक्ष्य अधूरा ही रहेगा। जिस दिन हिंदी सम्मान की भाषा के साथ-साथ शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, न्याय और तकनीक की व्यावहारिक भाषा बन जाएगी, उसी दिन राजभाषा हिंदी अपने वास्तविक अर्थ को प्राप्त करेगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)