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कहीं भारी न पड़ जाए फैसला

प्रकाशित: 16-09-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
कहीं भारी न पड़ जाए फैसला
सरकार ने बैंकों और भुगतान प्रणाली प्रदाताओं को 2000 रुपए तक यूपीआई लेनदेन या रूपे डेबिट कार्ड के जरिए किए गए भुगतान पर कोई भी शुल्क न लगाने का निर्देश दिया है। लेकिन 2000 रुपए से अधिक के लेनदेन पर .4 प्रतिशत की दर से शुल्क लागू होगा। यह शुल्क 15 अक्टूबर 2026 से लागू होगा। नए कर का भार उपभोक्ताओं की बजाए सेवा प्रदाता कंपनियों और व्यापारियों पर डाला गया है। अभी तक यूपीआई से किसी भी राशि के लेनदेन पर कोई शुल्क नहीं लगता था। लेकिन अब 2000 से अधिक यूपीआई भुगतान पर शुल्क निर्धारण भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) की अगुवाई वाली यूपीआई और सेवा संचालन समिति (एमडीआर) की दरों पर फैसला करके शुल्क का निर्धारण कर दिया है। सरकार ने शुल्क लगाने का जो कारण दिया है, उसके मुताबिक लेनदेन की संख्या में तेजी से वृद्धि के साथ प्रणाली को साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने और बुनियादी ढांचे में लगातार बड़े निवेश और उन्नयन की जरूरत है इसीलिए बाजार का विस्तार करने और यूपीआई प्रणाली को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शुल्क जरूरी है।
यदि सरकार के ही तर्क को मान लें कि अब सरकार यूपीआई को आत्मनिर्भर बनाने के लिए 2000 रुपए से अधिक पर चार्ज लगाकर प्रणाली को समृद्ध एवं आत्मनिर्भर बनाना चाहती है तो सवाल है कि क्या उसके ऐसा करने से बैंकों की लाइनों में और वृद्धि तथा कैश सिस्टम की वापसी होना तय है? सच तो यह है कि यूपीआई को ने बैंकों की शाखाओं पर होने वाली भीड़ को हतोत्साहित करने के लिए लाया और जिस सुविधा को लोकप्रिय और विदेशों में इसे प्रचलित किया अब उसे सम्पन्न और आत्मनिर्भर बनाने के लिए प्रतिबद्ध हो चुकी है। यह सच है ग्राहकों के लिए यूपीआई प्रणाली के बेहतर होने पर उन्हें कई तरह की सुविधाएं ली जा सकती हैं किन्तु सच यह भी है कि अर्थव्यवस्था को करों के जाल में फंसाने से आर्थिक उदारता या रिफार्म की धारणा का मतलब स्पष्ट है कि देश में करों का आतंक अर्थव्यवस्था को हमेशा डरवाती रहेगी। अच्छा तो यह होता कि सरकार कर सुधारों, सेवा सुधारों और साइबर क्राइम को रोकने पर काम करती किन्तु सरकार ने यूपीआई की सेवाओं की सौदेबाजी करना अच्छा समझा। सरकार को इस बात की अच्छी तरह समझा है कि यूपीआई से भुगतान करने वाले ज्यादातर मध्यम या उच्च मध्यम वर्ग के लोग संख्या में ज्यादा हैं तो जाहिर सी बात है कि उसी वर्ग से टैक्स भी सरकार को ज्यादा मिलेगा। इससे तो यही लगता है सरकार यूपीआई विश्वस्तरीय प्रणाली के रूप में स्थापित करना चाहती है। लेकिन इसी के साथ उसे यह भी स्मरण रखना चाहिए कि कमजोर वर्ग के लोगों पर उसके फैसले का दुष्प्रभाव न पड़े। 15 अक्टूबर से सरकार की इस कर व्यवस्था से आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा, इसका तो वित्तीय विश्लेषक ही अनुमान लगा सकते हैं किन्तु यदि सरकार अपना पक्ष आम जनता को समझाने में विफल रही तो उसे लेने के देने भी पड़ सकते हैं।