बेहतरी की उम्मीद
प्रकाशित: 23-09-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
वर्ल्ड इकोनामिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की मानें तो भारत की आर्थिक ग्रोथ को लेकर वैश्विक स्तर पर भरोसा बढ़ता दिखाई दे रहा है। असल में डब्ल्यूईएफ के सितम्बर के चीफ इकोनामिस्ट आउटलुक के मुताबिक आगामी 12 महीनों में भारत की आर्थिक वृद्धि को लेकर दुनिया के प्रमुख अर्थशास्त्रियों का दृष्टिकोण काफी मजबूत हुआ है। सर्वेक्षण में शामिल 98 प्रतिशत चीफ इकोनामिस्ट का आकलन है कि भारत की ग्रोथ मध्यम या उससे बेहतर रहेगी जबकि 74 प्रतिशत ने मजबूत या बहुत मजबूत होने का आकलन किया है। असल में अगस्त में डब्ल्यूईएफ ने भारत के ग्रोथ रेट का अनुमान 6.7 प्रतिशत लगाया था। ताजा रिपोर्ट जो सितम्बर में आई है, के मुताबिक ऊर्जा पर भारी खर्च का दबाव और भू राजनीतिक तनाव का भारत की अर्थव्यवस्था की कड़ी चुनौती हैं।
मजे की बात तो यह है कि भारत की तुलना में चीन की आर्थिक तस्वीर को लेकर अर्थशास्त्रियों का भरोसा कुछ कमजोर हुआ है। डब्ल्यूईएफ के अनुसार एक तिहाई अर्थशास्त्री चीन में कमजोर ग्रोथ का अनुमान लगा रहे हैं। वहीं यूरोप इस सर्वेक्षण में सबसे कमजोर बना हुआ है क्योंकि 61 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने यूरोप में कमजोर या अत्याधिक कमजोर आर्थिक वृद्धि का अनुमान लगाया है। सर्वेक्षण के मुताबिक इन दोनों आर्थिक क्षेत्रों के बीच ग्रोथ आउटलुक का अंतर पहले की तुलना में ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे रहा है। सच तो यह है कि मात्र 11 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने मई में वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर बेहतर होने की उम्मीद जताई थी किन्तु सितम्बर में 97 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने भू राजनीतिक संघर्षें को अगले एक साल में अनिश्चितता का संभावित प्रमुख स्रोत माना है जबकि 58 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों को असेट प्राइस में सुधार की आशंका है।
इसी रिपोर्ट में भारत में बिजनेस इन्वायरमेण्ट के रैंकिंग में गिरावट स्वीकार किया गया है यह दूसरी बात है कि आर्थिक ग्रोथ को 7.8 मानने के बाद की यह स्थिति है। मई की रिपोर्ट में भारत उन 3 शीर्ष देशों में शामिल था जो व्यापारिक गंतव्यों में सबसे ज्यादा पसंदीदा थे। 56 प्रतिशत अर्थशास्त्री मानते थे कि भारत में व्यावसायिक वातावरण अच्छा है किन्तु सितम्बर की रिपोर्ट में ऐसे मात्र 40 प्रतिशत अर्थशास्त्री ही रह गए हैं जो मान रहे हैं कि भारत में व्यापार करना आसान है।
वास्तविकता तो यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था पर वैश्विक तनाव और ऊर्जा संकट का भारी दबाव है लेकिन घरेलू मांग इस वक्त हमारी अर्थव्यवस्था की सहारा बनी हुई है। अमेरिका के 50 प्रतिशत टैरिफ को अंगूठा दिखाने में घरेलू मांग की बहुत ब़ड़ी भूमिका रही है। भारत ने अमेरिका के तेवर देखकर ही यूरोप, अफ्रीका के देशों और कुछ अन्य एशियाई देशों से मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। किन्तु अभी हमारे औद्योगिक उत्पादों को पूरी तरह अमेरिकी बाजारों का विकल्प नहीं मिल पाया है। यही कारण है कि भारत की बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस बात को लेकर आशंकित हैं कि एक तरफ जहां अमेरिकी सरकार और भारत के बीच टैरिफ को लेकर अंतिम फैसला ही नहीं हुआ, वहीं अमेरिका ने रूस और ईरान से तेल खरीदने पर भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी पर उतर आया है। बिजनेस इन्वायरमेण्ट में व्यवसायियों में घाटे की आशंका ही प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसके बावजूद दुनिया के अर्थशास्त्रियों ने यदि माना है कि वैश्विक स्तर पर भारत का आर्थिक वृद्धि दर सबसे मजबूत बना हुआ है तो इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता।
बहरहाल जिस गति से विश्व राजनीतिक प्रभाव से अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया जा रहा है, उसको देखते हुए भारतीय निष्पादन के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है बल्कि उम्मीद की जा सकती है कि भारत की वृद्धि दर इसी तरह स्थिर और गतिशील बनी रहेगी।
मजे की बात तो यह है कि भारत की तुलना में चीन की आर्थिक तस्वीर को लेकर अर्थशास्त्रियों का भरोसा कुछ कमजोर हुआ है। डब्ल्यूईएफ के अनुसार एक तिहाई अर्थशास्त्री चीन में कमजोर ग्रोथ का अनुमान लगा रहे हैं। वहीं यूरोप इस सर्वेक्षण में सबसे कमजोर बना हुआ है क्योंकि 61 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने यूरोप में कमजोर या अत्याधिक कमजोर आर्थिक वृद्धि का अनुमान लगाया है। सर्वेक्षण के मुताबिक इन दोनों आर्थिक क्षेत्रों के बीच ग्रोथ आउटलुक का अंतर पहले की तुलना में ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे रहा है। सच तो यह है कि मात्र 11 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने मई में वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर बेहतर होने की उम्मीद जताई थी किन्तु सितम्बर में 97 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों ने भू राजनीतिक संघर्षें को अगले एक साल में अनिश्चितता का संभावित प्रमुख स्रोत माना है जबकि 58 प्रतिशत अर्थशास्त्रियों को असेट प्राइस में सुधार की आशंका है।
इसी रिपोर्ट में भारत में बिजनेस इन्वायरमेण्ट के रैंकिंग में गिरावट स्वीकार किया गया है यह दूसरी बात है कि आर्थिक ग्रोथ को 7.8 मानने के बाद की यह स्थिति है। मई की रिपोर्ट में भारत उन 3 शीर्ष देशों में शामिल था जो व्यापारिक गंतव्यों में सबसे ज्यादा पसंदीदा थे। 56 प्रतिशत अर्थशास्त्री मानते थे कि भारत में व्यावसायिक वातावरण अच्छा है किन्तु सितम्बर की रिपोर्ट में ऐसे मात्र 40 प्रतिशत अर्थशास्त्री ही रह गए हैं जो मान रहे हैं कि भारत में व्यापार करना आसान है।
वास्तविकता तो यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था पर वैश्विक तनाव और ऊर्जा संकट का भारी दबाव है लेकिन घरेलू मांग इस वक्त हमारी अर्थव्यवस्था की सहारा बनी हुई है। अमेरिका के 50 प्रतिशत टैरिफ को अंगूठा दिखाने में घरेलू मांग की बहुत ब़ड़ी भूमिका रही है। भारत ने अमेरिका के तेवर देखकर ही यूरोप, अफ्रीका के देशों और कुछ अन्य एशियाई देशों से मुक्त व्यापार समझौते किए हैं। किन्तु अभी हमारे औद्योगिक उत्पादों को पूरी तरह अमेरिकी बाजारों का विकल्प नहीं मिल पाया है। यही कारण है कि भारत की बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस बात को लेकर आशंकित हैं कि एक तरफ जहां अमेरिकी सरकार और भारत के बीच टैरिफ को लेकर अंतिम फैसला ही नहीं हुआ, वहीं अमेरिका ने रूस और ईरान से तेल खरीदने पर भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी पर उतर आया है। बिजनेस इन्वायरमेण्ट में व्यवसायियों में घाटे की आशंका ही प्रतिकूल प्रभाव डालता है। इसके बावजूद दुनिया के अर्थशास्त्रियों ने यदि माना है कि वैश्विक स्तर पर भारत का आर्थिक वृद्धि दर सबसे मजबूत बना हुआ है तो इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता।
बहरहाल जिस गति से विश्व राजनीतिक प्रभाव से अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित किया जा रहा है, उसको देखते हुए भारतीय निष्पादन के प्रति आश्वस्त हुआ जा सकता है बल्कि उम्मीद की जा सकती है कि भारत की वृद्धि दर इसी तरह स्थिर और गतिशील बनी रहेगी।