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सकारात्मक रवैया

प्रकाशित: 11-09-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
सकारात्मक रवैया
चीनी विदेश मंत्रालय द्वारा बृहस्पतिवार को चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में 12 और 13 सितम्बर को शामिल होने की पुष्टि होने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया कि चीन ने अपने राष्ट्रपति को भारत भेजकर न सिर्फ ब्रिक्स के प्रति अपना सम्मान जताया है बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि भारत से होने वाली उसकी द्विपक्षीय वार्ता का एजेण्डा भी तैयार हो चुका है। दरअसल ब्रिक्स के सदस्य देशों द्वारा सम्मेलन में शामिल होने की पुष्टि तो पहले ही हो गई थी किन्तु चीन ने अपने राष्ट्रपति शी के शामिल होने की पुष्टि मात्र 48 घंटे पहले की और इसके पहले उसने चुप्पी साधे रखना ही बेहतर समझा। चीन की चुप्पी पर भारत में इस बात को लेकर संशय गहरा गया था कि कहीं राष्ट्रपति शी ब्रिक्स सम्मेलन में खुद शामिल न होकर अपने किसी प्रतिनिधि को भेजेंगे। लेकिन भारत में जो लोग चीन की कूटनीति को अच्छी तरह जानते हैं उन्हें इस बात का पता था कि आखिर चीन ब्रिक्स सम्मेलन में अपने राष्ट्रपति के शामिल होने को लेकर कोई प्रतिक्रिया देने से बच क्यों रहा है।
वास्तविकता तो यह है कि चीन की सरकार भारत में सम्मेलन के इतर 12 सितम्बर यानि शनिवार को राष्ट्रपति शी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच द्विपक्षीय बैठक के दौरान वार्ता के एजेण्डे को सुनिश्चित किए बिना अपने राष्ट्रपति शी के सम्मेलन में शामिल होने से बच रही थी। असल में नई दिल्ली और बीजिंग ने जब सीमा तनाव, व्यापार, असंतुलन, निवेश और लोगों के आवागमन जैसे विशेष संवेदनशील विषयों पर वार्ता का एजेण्डा तय कर लिया तभी राष्ट्रपति शी के ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने की घोषणा हुई।
भारत और चीन के संबंधों की हकीकत यही है कि दोनों देश जहां भू राजनीतिक क्षेत्र में एक-दूसरे के प्रति अत्यंत सतर्कता बरतते हैं, वहीं व्यापार के क्षेत्र में कोशिश करते हैं कि किसी तरह की बाधा न आए। सीमा क्षेत्र को ही लें तो वहां पर वार्ता के लिए सैनिक लगातार वार्ता और संवाद करते हैं किन्तु कूटनीतिक लचीलेपन का परिचय देते हुए दोनों ही देश के नेता एक दूसरे से मिलने में किसी तरह का संकोच नहीं करते। भारत बड़ी ही स्पष्टता से यह संदेश देने में सफल रहा कि वह किसी एक देश पर निर्भर रहना नहीं चाहता। भारत की विदेश नीति सभी देशों से अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए सकारात्मक कूटनीति अपनाना है। पाकिस्तान में इस बात को लेकर हाय तौबा मचा हुआ है कि उनकी सेना न तो सही तरीके से कूटनीति कर पाती और न ही युद्ध लड़ पाती। मतलब यह कि पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान ने अमेरिका की सेवा में खुद को इस हद तक समर्पित कर दिया कि चीन चिढ़ गया और अब पाकिस्तान के पावर सेक्टर और ढांचागत विकास की कई परियोजनाओं को बीच में छोड़कर दो टूक जवाब दिया कि उसे पाकिस्तान में विकास परियोजनाओं के प्रति कोई रुचि नहीं है। यह सच है कि पाकिस्तान के प्रति जिस तरह चीन ने अपनी कूटनीति बदली है, वह निश्चित रूप से भारत के लिए संतोष का विषय है। जब चीन ने पाकिस्तान को जे-35 देने से साफ तौर पर मना कर दिया तब भी भारत में कुछ उत्साही सुरक्षा विश्लेषक अनुमान लगा रहे थे कि चीन ने अब भारत के प्रति अपनी कूटनीति में बदलाव कर लिया है। लेकिन वास्तविकता यह नहीं है। वास्तविकता यह है कि भारत और चीन दोनों ही एक दूसरे को मित्र मानते ही नहीं और शत्रु बनाना चाहते नहीं। दोनों ही एक दूसरे के प्रति सतर्क हैं और यदि ऐसा अवसर मिलता है कि दोनों मिलकर साझा मुसीबत का समाधान कर सकते हैं तो किसी भी तरह से ऐसे अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहते। भारत और चीन दोनों ही अपने राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा और संवर्धन के लिए एक-दूसरे से सतर्क भी रहते हैं और सहयोग के लिए तत्पर भी रहते हैं। कुल मिलाकर ब्रिक्स में शामिल होने के लिए शी का भारत आना सकारात्मक संकेत है।