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बिहार में यूसीसी पर जदयू का विरोध

प्रकाशित: 16-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर केंद्र सरकार और बिहार में सत्तारूढ़ जनता दल (यू ) के बीच मतभेद उभरकर सामने आए हैं। केंद्रीय गृहमंत्री की ओर से 2029 में देश में समान नागरिक संहिता लागू करने संबंधी बयान ने जनता दल यूनाइटेड को असहज कर दिया है। इसके पीछे गठबंधन राजनीति, संविधान, राज्यों के अधिकार और सामाजिक विविधता से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं। यदि केंद्र सरकार देशव्यापी कानून लाने की दिशा में आगे बढ़ती है तो जदयू के सामने सबसे बड़ा सवाल होगा कि वह अपने सहयोगी केंद्र सरकार के फैसले का कितना और किस स्तर तक विरोध करेगी। समान नागरिक संहिता का अर्थ सामान्य रूप से ऐसी समान नागरिक कानूनी व्यवस्था से है जिसमें धर्म के आधार पर अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के बजाय विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और परिवार से जुड़े नागरिक मामलों में समान नियम लागू हों। सवाल यह उठेगा कि क्या जदयू केंद्र सरकार पर दबाव बनाकर कानून में बदलाव करा पाएगी, क्या वह संसद में इसका विरोध करेगी और यदि विरोध तथा सत्ता में भागीदारी के बीच टकराव बढ़ा तो उसकी राजनीतिक रणनीति क्या होगी। संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश दिया गया है। लेकिन यह नीति-निर्देशक तत्व है, मौलिक अधिकार नहीं। केंद्र की सत्ता में भागीदारी और बिहार में यूसीसी का विरोध इन दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाना जदयू के लिए आसान नहीं होगा। समान आचार संहिता का मुद्दा यदि धार्मिक स्वतंत्रता, व्यक्तिगत कानून और अल्पसंख्यक अधिकारों से जोड़कर देखा जाने लगा, तो बिहार की राजनीति में इसका असर और गहरा हो सकता है। विपक्षी दल भी इसे केंद्र सरकार के एजेंडे के खिलाफ व्यापक राजनीतिक अभियान का मुद्दा बना सकते हैं। केवल बिहार सरकार के यह कह देने से कि वह यूसीसी लागू नहीं करेगी, देशव्यापी केंद्रीय कानून अपने आप निष्प्रभावी नहीं हो जाएगा। यदि केंद्र सरकार कठोरता से देशव्यापी यूसीसी लागू करने की कोशिश करती है और जदयू बिहार में इसका विरोध जारी रखती है, तो गठबंधन राजनीति की वास्तविक परीक्षा होगी। सवाल यह उठेगा कि क्या जदयू केंद्र सरकार पर दबाव बनाकर कानून में बदलाव करा पाएगी, क्या वह संसद में इसका विरोध करेगी और यदि विरोध तथा सत्ता में भागीदारी के बीच टकराव बढ़ा तो उसकी राजनीतिक रणनीति क्या होगी। यह भी संभव है कि आने वाले दिनों में अदालतों के सामने इस विषय से जुड़े संवैधानिक प्रश्न उठें।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।