अनियंत्रित सोशल मीडिया देश की एकता-अखंडता के लिए घातक
प्रकाशित: 13-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
बसंत कुमार
पिछले दिनों सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ को हर समय देश के मुसलमानों को गद्दार आतंकवादी कहते सुना जाता है मानो इस देश के निर्माण में मुसलमानों का कोई योगदान ही न रहा हो। पिछले दिनों अपनी वीडियो में विभिन्न भाषा विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न धर्मों वाले देश के लोगों एकता अखंडता के सूत्र में बांध कर रखने वाले बेहतरीन संविधान को गवर्नमेंट ऑ़फ इंडिया एक्ट 1935 की जेरोक्स कॉपी कहा और ऐसा करके उन्होंने भारतीय संविधान सभा जिसमे देश के अधिकांश स्वतंत्रता सेनानी और बुद्धिजीवी थे जिन्होंने संविधान बनाने के लिए वर्षों मेहनत की का अपमान किया है, यही नहीं उसने अपने बेतुके तर्कों से 15 अगस्त 1947 को देश का स्वतंत्रता दिवस मानने से इनकार किया है ये ऐसे अराजक है जो हिंदू धर्म के नाम पर देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसे लोगो को सोशल मीडिया पर इस तरह की विभाजनकारी बाते बोलने की इजाजत दी जानी चाहिए, ये व्यक्ति परम्परा के नाम पर देश में मनु स्मृति का शासन लाना चाहता है।
जब देश आजाद हो रहा था तोकई लोगों द्वारा या विचार व्यक्त किए जाते थे कि हम क्या देश को 1000 वर्ष यानि गुलाम वर्ष की स्थापना से पूर्व की स्थिति की ओर ले जाना चाहिए पर देश की संविधान सभा के महान विचारकों ने एक ऐसे संविधान की आवश्यकता बताई जो विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, विभिन्न धर्मों वाले लोगों को एकता के सूत्र में बांध दे और डॉ. आंबेडकर की अध्यक्षता वाली प्रारूप समिति ने ऐसा ही संविधान बनाया। इस प्रश्न का जवाब देते हुए एकात्म मानववाद के प्रणेता और जनसंघ के दूसरे अध्यक्ष प. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था जो इस देश में रहता है इस देश की संस्कृति का मानता है वह हिंदू है।
राष्ट्र चौराहे पर खड़ा है, कुछ लोगों का सुझाव है कि हमे वहां से शुरू करना चाहिए जहा हमने एक हजार वर्ग पूर्व छोड़ा था। परंतु राष्ट्र मात्र एक कपड़ा नहीं है जिसे समय के अंतराल के बाद बदल कर फिर पहन लिया जाए! पंडित दीन दयाल उपाध्याय जैसे विद्वान व्यक्ति के इस कथन के बाद सोशल मीडिया पर कुछ स्वयंभू विद्वान अनाप-शनाप बोलते रहते हैं। सोशल मीडिया के ऐसे कथित विद्वान महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहने पर आपत्ति जताते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि देश में किसी की इतनी बड़ी हैसियत नहीं है कि महात्मा गांधी और डॉ. आंबेडकर के व्यक्तित्व के विषय में कुछ कह सके।
कुछ दिन पूर्व मैने सोशल मीडिया पर मनुस्मृति के समर्थक एक सवर्ण युवक की पोस्ट देखी जिसने डॉ. आंबेडकर की शिक्षा पर सवाल उठाए और कहा कि वे भारत में सदैव 3rd डिवीज़न में पास होते थे, पर विदेशों में कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पीएचडी, डॉक्टर ऑफ साइंस जैसी डिग्रियां कैसे प्राप्त कर ली विश्वास नहीं होता।
उस सवर्ण युवक के प्रश्न में ही जवाब मिल गया कि भारतीय विद्यालयों में नंबर जाति के आधार पर दिए जाते थे इसी कारण अंबेडकर को भारत में कभी भी 3rd डिवीजन से ऊपर नंबर नहीं मिले। वहीं कोलंबिया यूनिवर्सिटी में 8 वर्ष का कोर्स दो ढाई वर्ष में पूरा कर लिया और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उनकी मूर्ति उनके सम्मान में लगी है।
उस युवक का दूसरा कथन यह था कि डॉ. आंबेडकर को संस्कृत नहीं आती थी इस वजह से उन्होंने मनुस्मृति नहीं पढ़ी थी, इस बारे में भारत के पूर्व मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी जोशी ने एक लेख में लिखा था कि डॉ. आंबेडकर देश की सम्पर्क भाषा के रूप मे संस्कृत को चाहते थे और संसद की राजभाषा परिषद् की डिबेट में संस्कृत में भाषण दिया था, इस तरह डॉ. आंबेडकर जैसे विद्वान व्यक्ति के बारे में लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैलाना गलत के साथ साथ खतरनाक है इसलिए सोशल मीडिया पर क्या लिखा जा रहा है इस पर नियंत्रण आवश्यक है। इससे सामाजिक कटुता फैलेगी।
इस समय आरक्षण का विरोध करते हैं और आरक्षण समाप्त करने की बात करते हैं और इस मुहिम में कुछ सन्यासी और शंकर कुछ लोग बिना सोचे समझे लगे है हैरानी की बात यह है कि जब अपने सांसारिक मोहमाया त्याग कर संन्यासी का रूप धारण कर लिया तो फिर क्यों सवर्ण बनाम दलित जैसे राजनीतिक पचड़े में क्यों पड़ते हैं, इनको पता होना चाहिए कि ब्रिटिश इंडिया के वंचितों के लिये अलग निर्वाचक मंडल को असर विहीन करने के लिए डॉ. आंबेडकर और महात्मा गांधी ने 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए और देश का एक और विभाजन रोकने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया।
1989 में आती पिछड़े वर्गों का शासन में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को मंजूर करते हुए 27ज्ञ् आरक्षण सुनिश्चित किया और मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों के हितों को ध्यान रखते हुए 10ज्ञ् sिंंए आरक्षण की व्यवस्था की फिर क्यों आरक्षण को सवर्ण बनाम दलित के बीच लड़ाई बना दी गई है और कुछ लोग सोशल मीडिया पर इतना जहर उगल रहे हैं जिन्होंने न दसवीं पास की न कभी सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई किया बस रटते रहते हैं कि हम 90ज्ञ् लाकर सिलेक्ट नहीं हुआ और 40ज्ञ् वाला हो गया, यह सब झूठ है इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार बगैर प्रमाणिक तथ्य के सोशल मीडिया पर जहर घोलने वालो पर लगाम लगाये।
अनियंत्रित सोशल मीडिया आज के समय में देश की एकता, अखंडता और आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। डिजिटल क्रांति ने जहांलोगो को एक दूसरे से जोड़ने और विचारों के अभिव्यक्ति की आजादी को मजबूत करने का काम किया। पर जब से सोशल मीडिया अनियंत्रित हो गया और लोग अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों की आपूर्ति के लिए सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल करने लगे हैं, तब से देश में विभाजन और अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है। करनी सेना और जाति वादी संगठन से जुड़े छुटभैये सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने में लगे हैं। सोशल मीडिया देश और समाज की एकता और अखंडता को निम्न तरीके से प्रभावित करता है।
-बिना किसी सम्पादन या जवाबदेही के सोशल मीडिया पर अफवाहों और गलत जानकारियां फैलाई जाती है जो कई बार सांप्रदायिक दंगों, जातिगत हिंसा और सामाजिक तनाव का कारण बनती है।
-हेट स्पीच (घृणा फैलाने वाले वक्तव्य) देश के सामाजिक तानें बाने को कमजोर कर देते हैं।
-देश विरोधी ताकते और विदेशी एजेंसियां सोशल मीडिया का उपयोग करके देश के आंतरिक मामलों, चुनावों और नीतियों के खिलाफ सुनियोजित प्रोपगंडा चलाती है जो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिय खतरा है।
-सोशल मीडिया पलेट फॉर्म युवाओं को गुमराह करके उन्हें कट्टरपंथी विचारधारा या या अलगाववादी संगठनों की ओर ढकेल कर अपने साध्य की पूर्ति का माध्यम बनाते हैं।
-आधुनिक तकनीक जैसे डिफेक का इस्तेमाल करके नेताओं सुरक्षा बलों या महत्वपूर्ण व्यक्तियों फर्जी वीडियो बनाकर देश में अराजकता फैलाने की कोशिश हो रही है।
कैसी विडम्बना है कि सोशल मीडिया लोगो को एक दूसरे से जोड़ने और विचारों के अभिव्यक्ति की आजादी के लिए है पर आज लोग कुछ जाने परखे हमारे नायकों राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर, प. नेहरू के बारे में अनाप शनाप लिखते रहते है जबकि आज भी इंग्लैंड, अमेरिका सहित अनेक देश इन नायकों की मूर्तियां लगाकर इनसे प्रेरणा लेते हैं। अनियंत्रित सोशल मीडिया से निपटने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द के बीच संतुलन जरूरी है। सरकार के सख्त आई टी नियमों और डेटा संप्रभुता कानूनों को लागू करना होगा। वहीं सोशल मीडिया कंपनियों को भी अपनी जवाबदेही तय करते हुए फैक्ट चेकिंग मॉडरेशन को मजबूत करना होगा।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)
पिछले दिनों सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ को हर समय देश के मुसलमानों को गद्दार आतंकवादी कहते सुना जाता है मानो इस देश के निर्माण में मुसलमानों का कोई योगदान ही न रहा हो। पिछले दिनों अपनी वीडियो में विभिन्न भाषा विभिन्न संस्कृतियों, विभिन्न धर्मों वाले देश के लोगों एकता अखंडता के सूत्र में बांध कर रखने वाले बेहतरीन संविधान को गवर्नमेंट ऑ़फ इंडिया एक्ट 1935 की जेरोक्स कॉपी कहा और ऐसा करके उन्होंने भारतीय संविधान सभा जिसमे देश के अधिकांश स्वतंत्रता सेनानी और बुद्धिजीवी थे जिन्होंने संविधान बनाने के लिए वर्षों मेहनत की का अपमान किया है, यही नहीं उसने अपने बेतुके तर्कों से 15 अगस्त 1947 को देश का स्वतंत्रता दिवस मानने से इनकार किया है ये ऐसे अराजक है जो हिंदू धर्म के नाम पर देश में अराजकता फैलाना चाहते हैं अब प्रश्न यह उठता है कि ऐसे लोगो को सोशल मीडिया पर इस तरह की विभाजनकारी बाते बोलने की इजाजत दी जानी चाहिए, ये व्यक्ति परम्परा के नाम पर देश में मनु स्मृति का शासन लाना चाहता है।
जब देश आजाद हो रहा था तोकई लोगों द्वारा या विचार व्यक्त किए जाते थे कि हम क्या देश को 1000 वर्ष यानि गुलाम वर्ष की स्थापना से पूर्व की स्थिति की ओर ले जाना चाहिए पर देश की संविधान सभा के महान विचारकों ने एक ऐसे संविधान की आवश्यकता बताई जो विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, विभिन्न धर्मों वाले लोगों को एकता के सूत्र में बांध दे और डॉ. आंबेडकर की अध्यक्षता वाली प्रारूप समिति ने ऐसा ही संविधान बनाया। इस प्रश्न का जवाब देते हुए एकात्म मानववाद के प्रणेता और जनसंघ के दूसरे अध्यक्ष प. दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था जो इस देश में रहता है इस देश की संस्कृति का मानता है वह हिंदू है।
राष्ट्र चौराहे पर खड़ा है, कुछ लोगों का सुझाव है कि हमे वहां से शुरू करना चाहिए जहा हमने एक हजार वर्ग पूर्व छोड़ा था। परंतु राष्ट्र मात्र एक कपड़ा नहीं है जिसे समय के अंतराल के बाद बदल कर फिर पहन लिया जाए! पंडित दीन दयाल उपाध्याय जैसे विद्वान व्यक्ति के इस कथन के बाद सोशल मीडिया पर कुछ स्वयंभू विद्वान अनाप-शनाप बोलते रहते हैं। सोशल मीडिया के ऐसे कथित विद्वान महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहने पर आपत्ति जताते हैं जबकि वास्तविकता यह है कि देश में किसी की इतनी बड़ी हैसियत नहीं है कि महात्मा गांधी और डॉ. आंबेडकर के व्यक्तित्व के विषय में कुछ कह सके।
कुछ दिन पूर्व मैने सोशल मीडिया पर मनुस्मृति के समर्थक एक सवर्ण युवक की पोस्ट देखी जिसने डॉ. आंबेडकर की शिक्षा पर सवाल उठाए और कहा कि वे भारत में सदैव 3rd डिवीज़न में पास होते थे, पर विदेशों में कोलंबिया यूनिवर्सिटी और लन्दन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पीएचडी, डॉक्टर ऑफ साइंस जैसी डिग्रियां कैसे प्राप्त कर ली विश्वास नहीं होता।
उस सवर्ण युवक के प्रश्न में ही जवाब मिल गया कि भारतीय विद्यालयों में नंबर जाति के आधार पर दिए जाते थे इसी कारण अंबेडकर को भारत में कभी भी 3rd डिवीजन से ऊपर नंबर नहीं मिले। वहीं कोलंबिया यूनिवर्सिटी में 8 वर्ष का कोर्स दो ढाई वर्ष में पूरा कर लिया और कोलंबिया यूनिवर्सिटी में उनकी मूर्ति उनके सम्मान में लगी है।
उस युवक का दूसरा कथन यह था कि डॉ. आंबेडकर को संस्कृत नहीं आती थी इस वजह से उन्होंने मनुस्मृति नहीं पढ़ी थी, इस बारे में भारत के पूर्व मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी जोशी ने एक लेख में लिखा था कि डॉ. आंबेडकर देश की सम्पर्क भाषा के रूप मे संस्कृत को चाहते थे और संसद की राजभाषा परिषद् की डिबेट में संस्कृत में भाषण दिया था, इस तरह डॉ. आंबेडकर जैसे विद्वान व्यक्ति के बारे में लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर गलत जानकारी फैलाना गलत के साथ साथ खतरनाक है इसलिए सोशल मीडिया पर क्या लिखा जा रहा है इस पर नियंत्रण आवश्यक है। इससे सामाजिक कटुता फैलेगी।
इस समय आरक्षण का विरोध करते हैं और आरक्षण समाप्त करने की बात करते हैं और इस मुहिम में कुछ सन्यासी और शंकर कुछ लोग बिना सोचे समझे लगे है हैरानी की बात यह है कि जब अपने सांसारिक मोहमाया त्याग कर संन्यासी का रूप धारण कर लिया तो फिर क्यों सवर्ण बनाम दलित जैसे राजनीतिक पचड़े में क्यों पड़ते हैं, इनको पता होना चाहिए कि ब्रिटिश इंडिया के वंचितों के लिये अलग निर्वाचक मंडल को असर विहीन करने के लिए डॉ. आंबेडकर और महात्मा गांधी ने 1932 में पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किए और देश का एक और विभाजन रोकने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया।
1989 में आती पिछड़े वर्गों का शासन में भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मंडल आयोग की सिफारिशों को मंजूर करते हुए 27ज्ञ् आरक्षण सुनिश्चित किया और मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों के हितों को ध्यान रखते हुए 10ज्ञ् sिंंए आरक्षण की व्यवस्था की फिर क्यों आरक्षण को सवर्ण बनाम दलित के बीच लड़ाई बना दी गई है और कुछ लोग सोशल मीडिया पर इतना जहर उगल रहे हैं जिन्होंने न दसवीं पास की न कभी सरकारी नौकरी के लिए अप्लाई किया बस रटते रहते हैं कि हम 90ज्ञ् लाकर सिलेक्ट नहीं हुआ और 40ज्ञ् वाला हो गया, यह सब झूठ है इसलिए अब समय आ गया है कि सरकार बगैर प्रमाणिक तथ्य के सोशल मीडिया पर जहर घोलने वालो पर लगाम लगाये।
अनियंत्रित सोशल मीडिया आज के समय में देश की एकता, अखंडता और आंतरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। डिजिटल क्रांति ने जहांलोगो को एक दूसरे से जोड़ने और विचारों के अभिव्यक्ति की आजादी को मजबूत करने का काम किया। पर जब से सोशल मीडिया अनियंत्रित हो गया और लोग अपने निहित राजनीतिक स्वार्थों की आपूर्ति के लिए सोशल मीडिया का गलत इस्तेमाल करने लगे हैं, तब से देश में विभाजन और अस्थिरता का खतरा बढ़ गया है। करनी सेना और जाति वादी संगठन से जुड़े छुटभैये सामाजिक सौहार्द को बिगाड़ने में लगे हैं। सोशल मीडिया देश और समाज की एकता और अखंडता को निम्न तरीके से प्रभावित करता है।
-बिना किसी सम्पादन या जवाबदेही के सोशल मीडिया पर अफवाहों और गलत जानकारियां फैलाई जाती है जो कई बार सांप्रदायिक दंगों, जातिगत हिंसा और सामाजिक तनाव का कारण बनती है।
-हेट स्पीच (घृणा फैलाने वाले वक्तव्य) देश के सामाजिक तानें बाने को कमजोर कर देते हैं।
-देश विरोधी ताकते और विदेशी एजेंसियां सोशल मीडिया का उपयोग करके देश के आंतरिक मामलों, चुनावों और नीतियों के खिलाफ सुनियोजित प्रोपगंडा चलाती है जो देश की आंतरिक सुरक्षा के लिय खतरा है।
-सोशल मीडिया पलेट फॉर्म युवाओं को गुमराह करके उन्हें कट्टरपंथी विचारधारा या या अलगाववादी संगठनों की ओर ढकेल कर अपने साध्य की पूर्ति का माध्यम बनाते हैं।
-आधुनिक तकनीक जैसे डिफेक का इस्तेमाल करके नेताओं सुरक्षा बलों या महत्वपूर्ण व्यक्तियों फर्जी वीडियो बनाकर देश में अराजकता फैलाने की कोशिश हो रही है।
कैसी विडम्बना है कि सोशल मीडिया लोगो को एक दूसरे से जोड़ने और विचारों के अभिव्यक्ति की आजादी के लिए है पर आज लोग कुछ जाने परखे हमारे नायकों राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, संविधान निर्माता डॉ. आंबेडकर, प. नेहरू के बारे में अनाप शनाप लिखते रहते है जबकि आज भी इंग्लैंड, अमेरिका सहित अनेक देश इन नायकों की मूर्तियां लगाकर इनसे प्रेरणा लेते हैं। अनियंत्रित सोशल मीडिया से निपटने के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द के बीच संतुलन जरूरी है। सरकार के सख्त आई टी नियमों और डेटा संप्रभुता कानूनों को लागू करना होगा। वहीं सोशल मीडिया कंपनियों को भी अपनी जवाबदेही तय करते हुए फैक्ट चेकिंग मॉडरेशन को मजबूत करना होगा।
(लेखक भारत सरकार के पूर्व उप सचिव हैं।)