ब्रिक्स में दिल्ली घोषणापत्र आम सहमति से मंजूर
प्रकाशित: 13-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
विशेष प्रतिनिधि
नई दिल्ली। भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी के तौर पर, ब्रिक्स समूह ने शनिवार को आम सहमति से एक साझा घोषणापत्र को अपनाया। यह सहमति पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर यूएई और ईरान के बीच गहरे मतभेदों को दूर करने के बाद बनी। घोषणापत्र में ईरान पर हमलों को लेकर अमेरिका का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं किया गया।
ब्रिक्स नेताओं ने संघर्ष को ''संवाद और कूटनीति'' के जरिए समाप्त करने के भारत के रुख का समर्थन किया और ''लागू'' अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखलाओं और ऊर्जा के सुचारू प्रवाह को बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया। दो दिवसीय शिखर सम्मेलन के पहले दिन अंगीकार किए गए ब्रिक्स घोषणापत्र को भारतीय कूटनीति की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। घोषणापत्र के मसौदे को लेकर बातचीत आखिरी समय तक जारी रही, क्योंकि शुरुआत में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) दोनों ने अपना रुख कड़ा कर लिया था। ब्रिक्स आम सहमति के आधार पर काम करने वाला समूह है, जिसका मतलब है कि कोई भी एक सदस्य अंतिम संयुक्त घोषणापत्र को रोक सकता है। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, अबू धाबी के युवराज शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और समूह के अन्य शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में पहले दिन की बैठक समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणापत्र को अपनाए जाने की घोषणा की। घोषणापत्र में कहा गया, ''हम पश्चिम एशिया में तनाव के लगातार बढ़ने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं और अपने-अपने राष्ट्रीय रुख को ध्यान में रखते हुए अधिकतम संयम बरतने तथा ऐसी कार्रवाइयों से बचने का आह्वान करते हैं, जो हालात को और खराब कर सकती हैं।'' इसमें कहा गया, ''इसके अलावा, हम संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के पूरी तरह पालन करने के साथ देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने एवं आम नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह करते हैं।''
घोषणापत्र में कहा गया, ''हम संवाद और कूटनीति के माध्यम से ऐसे दीर्घकालिक समझौते की दिशा में प्रयास बढ़ाने को प्रोत्साहित करते हैं, जो क्षेत्र में स्थायी शांति, सुरक्षा और स्थिरता में योगदान देगा।'' ब्रिक्स ने लागू अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखलाओं और ऊर्जा के सुचारू प्रवाह को बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया। समूह ने पिछले साल अक्टूबर में हुए युद्ध विराम समझौते के बावजूद गाजा में जारी हिंसा पर भी ''गहरी चिंता'' व्यक्त की। घोषणापत्र में कहा गया, ''हम गाजापट्टी से फलस्तीनियों के जबरन विस्थापन की किसी भी नीति को रोकने का आह्वान करते हैं और ऐसी व्यवस्थाओं पर चिंता व्यक्त करते हैं, जो फलस्तीनी लोगों के बुनियादी अधिकारों को प्रभावित कर सकती हैं तथा कब्जे को वैध ठहरा सकती हैं या उसे लंबे समय तक जारी रख सकती हैं।'' घोषणापत्र में कहा गया, ''हम दोहराते हैं कि इजराइल-फलस्तीन संघर्ष का न्यायसंगत और स्थायी समाधान केवल शांतिपूर्ण तरीकों से ही हासिल किया जा सकता है और यह फलस्तीनी लोगों के वैध अधिकारों की पूर्ति पर निर्भर करता है, जिसमें आत्मनिर्णय और वापसी का अधिकार भी शामिल है।'' ब्रिक्स ने आतंकवाद को कतई बर्दाश्त नहीं करने और इस खतरे से निपटने में दोहरे मापदंड नहीं अपनाने की भारत की अपील का पूरा समर्थन किया। समूह के शीर्ष नेताओं ने इस चुनौती से निपटने के लिए मिलकर एक साझा दृष्टिकोण अपनाने पर सहमति जताई। ब्रिक्स ने पिछले साल जम्मू-कश्मीर में हुए पहलगाम आतंकी हमले की ''कड़े से कड़े शब्दों'' में निंदा की, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। घोषणापत्र में कहा गया, ''हम सभी तरह के आतंकवाद से निपटने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं, जिसमें आतंकवादियों की सीमा पार आवाजाही, आतंकवाद के वित्तपोषण और पनाहगाहों का मुकाबला करना भी शामिल है।'' घोषणापत्र में कहा गया, ''हम दोहराते हैं कि आतंकवाद को किसी भी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। आतंकवादी गतिविधियों में शामिल सभी लोगों और उन्हें समर्थन देने वालों को संबंधित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और न्याय के कठघरे में लाया जाना चाहिए।''
नई दिल्ली। भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक कामयाबी के तौर पर, ब्रिक्स समूह ने शनिवार को आम सहमति से एक साझा घोषणापत्र को अपनाया। यह सहमति पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर यूएई और ईरान के बीच गहरे मतभेदों को दूर करने के बाद बनी। घोषणापत्र में ईरान पर हमलों को लेकर अमेरिका का प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं किया गया।
ब्रिक्स नेताओं ने संघर्ष को ''संवाद और कूटनीति'' के जरिए समाप्त करने के भारत के रुख का समर्थन किया और ''लागू'' अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखलाओं और ऊर्जा के सुचारू प्रवाह को बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया। दो दिवसीय शिखर सम्मेलन के पहले दिन अंगीकार किए गए ब्रिक्स घोषणापत्र को भारतीय कूटनीति की बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है। घोषणापत्र के मसौदे को लेकर बातचीत आखिरी समय तक जारी रही, क्योंकि शुरुआत में ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) दोनों ने अपना रुख कड़ा कर लिया था। ब्रिक्स आम सहमति के आधार पर काम करने वाला समूह है, जिसका मतलब है कि कोई भी एक सदस्य अंतिम संयुक्त घोषणापत्र को रोक सकता है। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, अबू धाबी के युवराज शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान और समूह के अन्य शीर्ष नेताओं की मौजूदगी में पहले दिन की बैठक समाप्त होने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने घोषणापत्र को अपनाए जाने की घोषणा की। घोषणापत्र में कहा गया, ''हम पश्चिम एशिया में तनाव के लगातार बढ़ने पर गहरी चिंता व्यक्त करते हैं और अपने-अपने राष्ट्रीय रुख को ध्यान में रखते हुए अधिकतम संयम बरतने तथा ऐसी कार्रवाइयों से बचने का आह्वान करते हैं, जो हालात को और खराब कर सकती हैं।'' इसमें कहा गया, ''इसके अलावा, हम संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के पूरी तरह पालन करने के साथ देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने एवं आम नागरिकों और नागरिक बुनियादी ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह करते हैं।''
घोषणापत्र में कहा गया, ''हम संवाद और कूटनीति के माध्यम से ऐसे दीर्घकालिक समझौते की दिशा में प्रयास बढ़ाने को प्रोत्साहित करते हैं, जो क्षेत्र में स्थायी शांति, सुरक्षा और स्थिरता में योगदान देगा।'' ब्रिक्स ने लागू अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप वैश्विक व्यापार, आपूर्ति शृंखलाओं और ऊर्जा के सुचारू प्रवाह को बनाए रखने के लिए मिलकर काम करने की आवश्यकता पर जोर दिया। समूह ने पिछले साल अक्टूबर में हुए युद्ध विराम समझौते के बावजूद गाजा में जारी हिंसा पर भी ''गहरी चिंता'' व्यक्त की। घोषणापत्र में कहा गया, ''हम गाजापट्टी से फलस्तीनियों के जबरन विस्थापन की किसी भी नीति को रोकने का आह्वान करते हैं और ऐसी व्यवस्थाओं पर चिंता व्यक्त करते हैं, जो फलस्तीनी लोगों के बुनियादी अधिकारों को प्रभावित कर सकती हैं तथा कब्जे को वैध ठहरा सकती हैं या उसे लंबे समय तक जारी रख सकती हैं।'' घोषणापत्र में कहा गया, ''हम दोहराते हैं कि इजराइल-फलस्तीन संघर्ष का न्यायसंगत और स्थायी समाधान केवल शांतिपूर्ण तरीकों से ही हासिल किया जा सकता है और यह फलस्तीनी लोगों के वैध अधिकारों की पूर्ति पर निर्भर करता है, जिसमें आत्मनिर्णय और वापसी का अधिकार भी शामिल है।'' ब्रिक्स ने आतंकवाद को कतई बर्दाश्त नहीं करने और इस खतरे से निपटने में दोहरे मापदंड नहीं अपनाने की भारत की अपील का पूरा समर्थन किया। समूह के शीर्ष नेताओं ने इस चुनौती से निपटने के लिए मिलकर एक साझा दृष्टिकोण अपनाने पर सहमति जताई। ब्रिक्स ने पिछले साल जम्मू-कश्मीर में हुए पहलगाम आतंकी हमले की ''कड़े से कड़े शब्दों'' में निंदा की, जिसमें 26 लोग मारे गए थे। घोषणापत्र में कहा गया, ''हम सभी तरह के आतंकवाद से निपटने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हैं, जिसमें आतंकवादियों की सीमा पार आवाजाही, आतंकवाद के वित्तपोषण और पनाहगाहों का मुकाबला करना भी शामिल है।'' घोषणापत्र में कहा गया, ''हम दोहराते हैं कि आतंकवाद को किसी भी धर्म, राष्ट्रीयता, सभ्यता या जातीय समूह से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। आतंकवादी गतिविधियों में शामिल सभी लोगों और उन्हें समर्थन देने वालों को संबंधित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के अनुसार जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए और न्याय के कठघरे में लाया जाना चाहिए।''