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राष्ट्रीय वन शहीद दिवस,बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व प्रबंधन ने कर्तव्य की वेदी पर प्राण न्योछावर करने वाले वनकर्मियों को दी भावभीनी श्रद्धांजलि

प्रकाशित: 13-09-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
गोपालदास बन्सल
शहडोल/ उमरिया। 11 सितंबर को मनाए जाने वाले राष्ट्रीय वन शहीद दिवस के अवसर पर बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में वनों एवं वन्यजीवों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति देने वाले वीर वनकर्मियों को नमन किया गया। ताला स्थित जैव विविधता प्रशिक्षण केंद्र परिसर में निर्मित 'शहीद स्मारक' पर श्रद्धांजलि कार्पाम आयोजित किया गया, जहाँ क्षेत्र संचालक के नेतृत्व में सभी अधिकारियों व कर्मचारियों ने श्रद्धासुमन अर्पित कर दो मिनट का मौन रख कर शहीदों की शहादत को याद किया। इस अवसर पर सहायक संचालक जितेंद्र अवासे, उपवनमंडलाधिकारी मानपुर नितिन निगम, वन परिक्षेत्र अधिकारी मानपुर बफर अंकित सोनी, वन परिक्षेत्र अधिकारी ताला राहुल किरार तथा सहायक अनुदेशक बलराम कंवर सहित बड़ी संख्या में वनकर्मी, गाइडस एवं अग्रिम पंक्ति का अमला मौजूद रहे। कार्पाम को संबोधित करते हुए क्षेत्र संचालक ने 11 सितंबर के ऐतिहासिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस दिन को वन और पर्यावरण संरक्षण में सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीरों की याद में समर्पित किया गया है। खेजड़ली का ऐतिहासिक बलिदान (1730) यह दिन वर्ष 1730 में राजस्थान के जोधपुर जिले के खेजड़ली गाँव में घटी ऐतिहासिक घटना से जुड़ा है। मारवाड़ (जोधपुर) के तत्कालीन महाराजा अभय सिंह ने अपने नए महल के निर्माण के लिए खेजड़ी के हरे वृक्षों को काटने का आदेश दिया था। बिश्नोई समाज में खेजड़ी के वृक्षों को पवित्र माना जाता है। जब राजा के सैनिक पेड़ काटने पहुंचे, तब गाँव की एक साहसी महिला अमृता देवी बिश्नोई ने इसका कड़ा विरोध किया। उन्होंने प्रसिद्ध कथन दिया, "सर साठे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण" (अर्थात यदि सिर कटवाकर भी एक पेड़ बचता है, तो यह सौदा सस्ता है)। अमृता देवी और उनकी तीन पुत्रियों ने पेड़ों को अपनी बांहों में भरकर (चिपक कर) उनकी रक्षा करने का प्रयास किया, लेकिन सैनिकों ने उन्हें मौत के घाट उतार दिया। इस घटना की खबर फैलते ही आसपास के 83 गांवों के बिश्नोई लोग एकत्र हो गए और एक-एक करके 363 लोगों ने पेड़ों को बचाने के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए। पर्यावरण रक्षा के इतिहास में यह दुनिया का सबसे बड़ा और अभूतपूर्व बलिदान माना जाता है। पर्यावरण मंत्रालय द्वारा वर्ष 2013 में 11 सितंबर को आधिकारिक रूप से 'राष्ट्रीय वन शहीद दिवस' घोषित किया गया था।
खेजड़ली गाँव में अमृता देवी और बिश्नोई समाज के इस बलिदान ने स्वतंत्र भारत में 1970 के दशक में उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तर प्रदेश) में शुरू हुए प्रसिद्ध 'चिपको आंदोलन' (ण्प्ग्ज्क्द श्दनसहू) की नींव रखी। पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट और गौरा देवी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने पेड़ों से चिपककर (आलिंगन कर) ठेकेदारों द्वारा वनों की कटाई को रोका था। क्षेत्र संचालक ने कहा कि बिश्नोई समाज का बलिदान और हमारे वनकर्मियों का दिन-रात मुस्तैदी से जंगल की रक्षा करना हमें प्रकृति संरक्षण का संदेश देता है।