ब्रिक्स की सफलता
प्रकाशित: 13-09-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
ब्रिक्स का 18वां सम्मेलन इस दृष्टि से शानदार रहा कि संयुक्त घोषणा पत्र आम सहमति से अंगीकार कर लिया गया। दरअसल ब्रिक्स के सदस्य देशों में इतना विरोधाभास होने के बावजूद सभी सदस्य देशों ने ब्रिक्स का मान बनाए रखने के लिए अपनी-अपनी अहम ग्रंथि पर विजय हासिल की और घोषणा पत्र के जारी होने की प्रक्रिया में कोई बाधा पैदा नहीं की। यह कोई सामान्य बात नहीं है कि भारत-चीन के परस्पर विरोधी हित, सऊदी अरब और यूएई में परस्पर विरोधी हित, ब्राजील और साउथ अफ्रीका के हितों में तीव्र मतभेद होने के बावजूद किसी ने भी अपने हितों को सामने रखकर ब्रिक्स की उपेक्षा की हो।
सच तो यह है कि किसी भी संगठन में इतने आत्म विरोधी पक्षों का घोषणा पत्र का एक साथ स्वीकार करने का सीधा कारण यह है कि ब्रिक्स अपने द्विपक्षीय संबंधों को संगठन के मंच पर लाना उचित नहीं समझा। प्राय संगठनों में बिखराव तभी आता है जब सदस्य देश अपनी समस्याओं को द्विपक्षीय मंचों तक सीमित कर लेते हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है सार्क संगठन जिसका कि नामोनिशान मिट गया। इस संगठन का दुरुपयोग पाकिस्तान भारत के खिलाफ अपनी भड़ास निकालने के लिए किया करता था। परिणाम यह हुआ कि पिछले 10 वर्षें से उसका कोई सम्मेलन ही नहीं हुआ।
सबसे अच्छी बात तो यह हुई कि ब्रिक्स के सदस्य देशों ने किसी तरह के टकराव का रास्ता नहीं अपनाया। यह सही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी आदत के अनुसार खूब शोर मचाया कि ब्रिक्स देश डालर के खिलाफ संगठन की नई करेंसी लाने वाले हैं ताकि अमेरिका के हितों को प्रभावित किया जा सके किन्तु ब्रिक्स देशों के नेताओं बड़ी ही चतुराई से डालर के खिलाफ कोई रणनीति बनाने से बिल्कुल दूरी बनाते दिखे। इतना जरूर हुआ कि ब्रिक्स के सदस्य देशों ने बिना किसी तरह के संकोच के यह सुनिश्चित किया कि सभी सदस्य व्यापार के लिए अपने-अपने देशों की करेंसी को बढ़ावा देते रहेंगे। ब्रिक्स की रणनीति से यह तो स्पष्ट हो गया कि यह संगठन किसी एक देश विशेष के खिलाफ नहीं है। वह तो अपने-अपने देशों के हितों की सुरक्षा पर ही ध्यान केन्द्रित किए हुए हैं। इससे एक बात और साबित हो गई कि ब्रिक्स देश के इस संगठन का नेतृत्व करने वाले देश धीर-गंभीर और विचारशील हैं। ब्रिक्स नेताओं को इस तथ्य की अच्छी तरह जानकारी है कि यदि वे ट्रंप से उलझे तो ब्रिक्स अपने उद्देश्य से भटक जाएगा।
असल में ब्रिक्स का गठन ही ग्रुप-7 के सदस्य देशों की आभिजात्य मानसिकता से अलग ग्लोबल साउथ के देशों को जोड़ने के लिए हुआ था। जिस तरह शनिवार को सदस्य देशों ने एकजुटता दिखाई उससे यह अनुमान बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है कि न सिर्फ ब्रिक्स का भविष्य उज्जवल है बल्कि नई दिल्ली में इसका आयोजन हमारे लिए गौरव की बात है। भारत, रूस और चीन के नेतृत्व ने साबित कर दिया कि ब्रिक्स न तो किसी की दया पर निर्भर है और न ही किसी को निशाना बनाता है। इसीलिए इस संगठन की सबसे बड़ी विशेषता है कि अपने आर्थिक ढांचे में विकास के लिए सदस्य देशों ने सकारात्मकता को महत्व दिया। यही कारण है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों में अपने एजेण्डे के प्रति भले ही जागरूकता है किन्तु किसी भी देश ने इस तरह का आचरण नहीं किया जिससे कि ब्रिक्स संगठन की एकात्मकता प्रभावित हो। यही है ब्रिक्स की सफलता।
सच तो यह है कि किसी भी संगठन में इतने आत्म विरोधी पक्षों का घोषणा पत्र का एक साथ स्वीकार करने का सीधा कारण यह है कि ब्रिक्स अपने द्विपक्षीय संबंधों को संगठन के मंच पर लाना उचित नहीं समझा। प्राय संगठनों में बिखराव तभी आता है जब सदस्य देश अपनी समस्याओं को द्विपक्षीय मंचों तक सीमित कर लेते हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है सार्क संगठन जिसका कि नामोनिशान मिट गया। इस संगठन का दुरुपयोग पाकिस्तान भारत के खिलाफ अपनी भड़ास निकालने के लिए किया करता था। परिणाम यह हुआ कि पिछले 10 वर्षें से उसका कोई सम्मेलन ही नहीं हुआ।
सबसे अच्छी बात तो यह हुई कि ब्रिक्स के सदस्य देशों ने किसी तरह के टकराव का रास्ता नहीं अपनाया। यह सही है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी आदत के अनुसार खूब शोर मचाया कि ब्रिक्स देश डालर के खिलाफ संगठन की नई करेंसी लाने वाले हैं ताकि अमेरिका के हितों को प्रभावित किया जा सके किन्तु ब्रिक्स देशों के नेताओं बड़ी ही चतुराई से डालर के खिलाफ कोई रणनीति बनाने से बिल्कुल दूरी बनाते दिखे। इतना जरूर हुआ कि ब्रिक्स के सदस्य देशों ने बिना किसी तरह के संकोच के यह सुनिश्चित किया कि सभी सदस्य व्यापार के लिए अपने-अपने देशों की करेंसी को बढ़ावा देते रहेंगे। ब्रिक्स की रणनीति से यह तो स्पष्ट हो गया कि यह संगठन किसी एक देश विशेष के खिलाफ नहीं है। वह तो अपने-अपने देशों के हितों की सुरक्षा पर ही ध्यान केन्द्रित किए हुए हैं। इससे एक बात और साबित हो गई कि ब्रिक्स देश के इस संगठन का नेतृत्व करने वाले देश धीर-गंभीर और विचारशील हैं। ब्रिक्स नेताओं को इस तथ्य की अच्छी तरह जानकारी है कि यदि वे ट्रंप से उलझे तो ब्रिक्स अपने उद्देश्य से भटक जाएगा।
असल में ब्रिक्स का गठन ही ग्रुप-7 के सदस्य देशों की आभिजात्य मानसिकता से अलग ग्लोबल साउथ के देशों को जोड़ने के लिए हुआ था। जिस तरह शनिवार को सदस्य देशों ने एकजुटता दिखाई उससे यह अनुमान बड़ी आसानी से लगाया जा सकता है कि न सिर्फ ब्रिक्स का भविष्य उज्जवल है बल्कि नई दिल्ली में इसका आयोजन हमारे लिए गौरव की बात है। भारत, रूस और चीन के नेतृत्व ने साबित कर दिया कि ब्रिक्स न तो किसी की दया पर निर्भर है और न ही किसी को निशाना बनाता है। इसीलिए इस संगठन की सबसे बड़ी विशेषता है कि अपने आर्थिक ढांचे में विकास के लिए सदस्य देशों ने सकारात्मकता को महत्व दिया। यही कारण है कि ब्रिक्स के सदस्य देशों में अपने एजेण्डे के प्रति भले ही जागरूकता है किन्तु किसी भी देश ने इस तरह का आचरण नहीं किया जिससे कि ब्रिक्स संगठन की एकात्मकता प्रभावित हो। यही है ब्रिक्स की सफलता।