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राज्य सरकार को कानून के दुरुपयोग को रोकना होगा

प्रकाशित: 13-09-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत को रद्द किए जाने का मामला उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक कार्रवाई, नागरिक स्वतंत्रता और कानून के दुरुपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। उपलब्ध समाचार विवरण के अनुसार, अदालत ने आकृति चौधरी की हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सरकार की ओर से प्रस्तुत घटनाक्रम और हिरासत के आधार पर गंभीर आपत्ति जताई तथा सरकारी कहानी को मनगढ़ंत बताया। मामले की पृष्ठभूमि नोएडा के औद्योगिक क्षेत्र में मजदूरों से जुड़े आंदोलन और अप्रैल 2026 में सामने आए घटपाम से जुड़ी बताई गई है। आकृति चौधरी को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून, 1980 के तहत हिरासत में लिया गया था। रासुका सामान्य आपराधिक कानून से अलग एक असाधारण कानून है, जिसके तहत किसी व्यक्ति को भविष्य में संभावित गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था अथवा देश की सुरक्षा को होने वाले खतरे के आधार पर निरुद्ध किया जा सकता है। इसलिए इस कानून का इस्तेमाल करते समय प्रशासन के लिए ठोस, विश्वसनीय और कानूनी रूप से टिकाऊ आधार प्रस्तुत करना आवश्यक है। रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि जब किसी व्यक्ति के विरुद्ध सामान्य आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है, तब उसे रासुका जैसे कठोर कानून के अंतर्गत हिरासत में रखने की आवश्यकता और औचित्य क्या था। अदालत की ऐसी टिप्पणी इस व्यापक सिद्धांत को मजबूत करती है कि निवारक हिरासत को किसी व्यक्ति को लंबे समय तक जेल में रखने का आसान माध्यम नहीं बनाया जा सकता। इस मामले में नोएडा के तत्कालीन जिलाधिकारी की भूमिका भी न्यायिक जांच के दायरे में आई। अदालत द्वारा पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाए जाने की खबर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने के लिए प्रस्तुत दस्तावेजों और तथ्यों में गंभीर खामियां पाई जाती हैं, तो यह केवल प्रशासनिक भूल नहीं बल्कि संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न बन जाता है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। अनुच्छेद 22 निवारक हिरासत के मामलों में भी कुछ संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है। इसलिए रासुका के इस्तेमाल में प्रशासन को यह सुनिश्चित करना होता है कि कानून का उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखना हो, न कि किसी असहमति, आंदोलन या विरोध की आवाज को दबाना।
इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और प्रशासन के पास व्यापक शक्तियां जरूर हैं, लेकिन उन शक्तियों पर न्यायिक नियंत्रण भी उतना ही आवश्यक है। यदि हाईकोर्ट ने सरकारी दावों को तथ्यात्मक रूप से अविश्वसनीय पाया है, तो यह प्रशासन के लिए गंभीर चेतावनी है कि निवारक हिरासत जैसे कठोर कानून का इस्तेमाल पूरी जिम्मेदारी, पारदर्शिता और प्रमाणित तथ्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
यह मामला केवल आकृति चौधरी की हिरासत तक सीमित नहीं है। यह उस बड़े सवाल को सामने लाता है कि क्या किसी आंदोलन, विरोध अथवा प्रशासन के विरुद्ध उठने वाली आवाज को कानून-व्यवस्था का खतरा मानकर रासुका जैसी कठोर धाराओं में दबाया जाना उचित है। लोकतंत्र में असहमति को अपराध मान लेना लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए खतरनाक हो सकता है।
-वीरेंद्र कुमार जाटव,
नई दिल्ली।