गंगोत्री से गंगासागर तक वेग के साथ बढ़ती भाजपा की ‘हिदूधारा’
प्रकाशित: 08-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
राजनीति का खेल अनिाित है। पािम बंगाल ने एक संकेत दिया है। उत्तर प्रदेश में क्या होगा, समय बताएगा। वोटर ही राजा है। उसकी सोच बदलेगी, तो फार्मूले भी बदलेंगे।
गंगोत्री से गंगासागर तक वेग के साथ बढ़ती भाजपा की ‘हिदूधारा’
पािम बंगाल में जीत के बाद एक नया ट्रेंड दिखाईं दे रहा है।
पहले जो भाजपा कहा करती थी कि हमें मुसलमानों का वोट नहीं मिलता है, अब वही भाजपा खुलेआम कहती है कि वह हिदुओं के वोट से चुनाव जीती है। इसके साथ ही यह भी जोड़ देती है कि जो हमारे साथ था, हम उसके साथ हैं।
जबकि इससे पहले मोदी कहा करते थे ‘सबका साथ, सबका विकास’। सवाल यह है कि क्या अब बीजेपी बदल रही है? बीजेपी लगातार हिदूधारा के सहारे आगे बढ़ती जा रही है। हिदुओं को एकजुट करने के लिए बीजेपी का यह चुनावी मंत्र कहीं उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के पीडीए की धार तो वुंद नहीं कर देगा, जैसा 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में देखा जा चुका है। कहीं ऐसा न हो कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के सहारे भाजपा को काफी हद तक रोकने में सफल रहे सपा प्रमुख अखिलेश यादव का यह फार्मूला 2027 में धराशायी हो जाए। वैसे भी हर चुनाव में वोटरों की सोच बदलती रहती है।
राजनीति में कोईं भी फार्मूला हमेशा के लिए हिट नहीं होता है।
ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पािम बंगाल में बीजेपी की शानदार जीत ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। वहां की सड़कों पर उत्सव मनाते कार्यंकर्ता चिल्ला रहे हैं कि हम हिदुओं के वोटों से जीते। पहले जहां बीजेपी कहती थी कि मुसलमानों का वोट हमें नहीं मिलता, अब वही दल खुलकर स्वीकार कर रहा है कि हिदू भाइयों के बल पर हमने सत्ता की वुसा हासिल की। साथ ही जोर देकर कहते हैं कि जो हमारे साथ रहा, हम उसके साथ हैं। यह नया सुर सुनकर सवाल उठता है कि क्या बीजेपी अपना रास्ता बदल रही है? प्रधानमंत्री का पुराना नारा तो था ‘सबका साथ, सबका विकास’, लेकिन अब लगता है हिदू एक जुटता का जाप जोर पकड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह बदलाव अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले को चुनौती दे सकता है।
दोबारा देखें तो 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में यही हिदू वोटों का ध्रुवीकरण सपा को पटखनी दे चुका है, तो क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में सफल रहा पीडीए का जादू अब फीका पड़ जाएगा? बहरहाल, पािम बंगाल में हुईं जीत कोईं साधारण घटना नहीं है। वहां बीजेपी ने टीएमसी के किले को हिलाकर रख दिया। कार्यंकर्ता खुशी से पूले नहीं समा रहे। वे मंचों पर चढ़कर घोषणा कर रहे हैं कि हिदू भाइयों ने हमें चुना, इसलिए हम उनके हितों की रक्षा करेंगे।
पहले बीजेपी पर इल्जाम लगता था कि वह मुसलमान वोटों से वंचित है। अब उसी दल के नेता बिना झिझक कह रहे हैं कि हिदुओं की एकजुटता ही हमारी ताकत है। जो हमारे साथ खड़ा हुआ, हम उसी के साथ खड़े रहेंगे। यह बातें सुनकर विपक्षी दल सन्न रह गए। तृणमूल कांग्रेस तो पहले से ही आरोप लगाती रही है कि बीजेपी ध्रुवीकरण की राजनीति करती है, लेकिन अब बीजेपी खुद इसे स्वीकार कर रही है। क्या यह रणनीति का नया मोड़ है? पािम बंगाल जैसे राज्य में, जहां हिदू आबादी बहुमत में है लेकिन बिखरी हुईं रही, वहां यह नारा काम कर गया। अब सवाल यह है कि क्या यही नारा उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी धमाल मचाएगा? उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही जटिल रही है। यहां वोट बैंक की गणित बड़ी बारीकी से सेट होती है। अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए का फार्मूला अपनाया।
पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट कर भाजपा को कड़ी टक्कर दी। सपा ने समाजवादी नीतियों के साथ गठबंधन की ताकत दिखाईं। कईं सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन विधानसभा चुनावों का इतिहास वुछ और कहता है। 2017 में भाजपा ने हिदू कार्ड खेला। राम मंदिर का मुद्दा उठाया। गोरखपुर से बनारस तक हिदू एकता का नारा गूंजा। नतीजा, सपा-बसपा गठबंधन धूल चाट गया। फिर 2022 में भी यही हुआ।
योगी आदित्यनाथ ने बुलडोजर की राजनीति से अपराधियों पर नकेल कसी। हिदू वोट सिमटे। सपा का पीडीए फार्मूला पेल हो गया।
अखिलेश यादव पिछड़ों को जोड़ने की कोशिश करते रहे, लेकिन हिदू ध्रुवीकरण ने सब बर्बाद कर दिया।
अब पािम बंगाल की जीत के बाद बीजेपी फिर वही पुराना हथियार उठा रही है। क्या अखिलेश का पीडीए फिर वुंद पड़ जाएगा? जानकार कहते हैं कि राजनीति में वोटरों की सोच बदलती रहती है। हर चुनाव अलग कहानी लिखता है। कोईं फार्मूला हमेशा हिट नहीं होता। 2014 में मोदी लहर चली। ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा गूंजा।
विकास, राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम ने कांग्रेस को धराशायी कर दिया। लेकिन 2019 में राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा हावी रहा।
पुलवामा हमला और बालाकोट स्ट्राइक ने हिदू राष्ट्रवाद को पंख दिए। 2024 में विपक्ष ने एकता दिखाईं। इंडिया गठबंधन बना।
उत्तर प्रदेश में पीडीए ने कमाल कर दिया। सपा ने कहा कि हम सबको साथ लेंगे। यादव, मुस्लिम और दलित को जोड़ा। वुछ हद तक सफल रहे। लेकिन अब बीजेपी बंगाल मॉडल को यूपी में आजमाने को तैयार है। वहां हिदू वोटों से जीतकर उत्साहित नेता कह रहे हैं कि यही फार्मूला राष्ट्रीय स्तर पर चलेगा। उत्तर प्रदेश में हिदू आबादी करीब 80™ है। अगर ये एकजुट हो गए, तो पीडीए का क्या होगा? भाजपा के नेता अब खुलकर कह रहे हैं। पािम बंगाल में ममता बनजा की पाटा पर हमला बोला गया कि वे हिदू विरोधी हैं, इसलिए हिदुओं ने हमें चुना। अब उत्तर प्रदेश में भी योगी आदित्यनाथ ऐसा ही करेंगे। बुलडोजर अब भी खड़ा है। कानून-व्यवस्था का डर दिखाकर हिदू वोट साधे जाएंगे।
अखिलेश यादव को चुनौती दी जाएगी कि तुम्हारा पीडीए सिर्प वोट लेने का धंधा है। हम हिदुओं के सच्चे हितैषी हैं। मंदिर-मस्जिद विवाद फिर गरमाएगा। अयोध्या राम मंदिर का श्रेय लिया जाएगा।
काशी और मथुरा पर नजर रखी जाएगी। क्या अल्पसंख्यक वोट सपा के पास टिवेंगे? या डर से बिखर जाएंगे? 2017 और 2022 में यही हुआ था। मुसलमान वोट सपा को मिले, लेकिन हिदू भाजपा के पाले में चले गए।
अब 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। भाजपा बंगाल का जाप यूपी में गूंजाएगी।
अखिलेश यादव की मुश्किल बढ़ सकती है। उनका पीडीए पिछड़ों को लुभाने का प्रयास है। लेकिन हिदू ध्रुवीकरण में ब्राrाण, ठावुर, वैश्य सब भाजपा की गोद में चले जाते हैं। दलित भी कभी-कभी बहुजन समाज पाटा से नाराज होकर भाजपा की ओर झुक जाते हैं। 2024 में सपा ने ब्राrाण चेहरों को आगे किया। वुछ सफलता मिली। लेकिन अगर भाजपा कहे कि हम हिदू एकता के लिए लड़ रहे हैं, तो ब्राrाण वोट फिसल सकते हैं। यादव भाईंचारे पर सपा निर्भर है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में हिदू भावना भड़क सकती है। अखिलेश को नया जवाब ढूंढना होगा। शायद विकास और रोजगार पर जोर दें या गठबंधन मजबूत करें। लेकिन राजनीति में वोटर का मन बदलता है। पािम बंगाल ने दिखा दिया कि हिदू नारा कितना कारगर है।
विपक्षी दलों को भी सोचना होगा।
कांग्रेस और अन्य दल भाजपा के इस नए सुर से परेशान हैं। वे कहते हैं कि यह संविधान विरोधी है।
लेकिन जनता क्या सोचेगी? इस पर उत्तर प्रदेश के गांवों में चाय की दुकानों पर बहस छिड़ जाएगी। कोईं कहेगा भाजपा सही कह रही है, हिदू एकजुट हो जाओ। कोईं बोलेगा अखिलेश सबको साथ लेकर चलेगा। चुनावी रणनीति बदल रही है। भाजपा का ‘सबका साथ’ वाला नारा पीछे छूट रहा है। अब हिदू हित का जाप है।
पािम बंगाल की जीत इसका प्रमाण है। उत्तर प्रदेश में अगर यही चला, तो सपा का पीडीए धराशायी हो सकता है। यह सब वोटरों की सोच पर निर्भर है। हर चुनाव नईं उम्मीदें जगाता है, लेकिन इतिहास दोहराने का खतरा मंडरा रहा है। यह बदलाव भाजपा के लिए बड़ा दांव है। पहले वे सभी को लुभाते थे, अब खुलकर हिदू कार्ड खेल रहे हैं। क्या इससे मुस्लिम वोट पूरी तरह खिसक जाएंगे? या विकास के नाम पर वुछ लौट आएंगे? उप्र में परीक्षा कठिन है। यहां जातियां बिखरी हैं। यादव, जाट, वुमा, मौर्यं सब अलग-अलग सोचते हैं।
पीडीए ने इन्हें जोड़ा था, लेकिन हिदू एकता का नारा इन सबको लपेट सकता है। अखिलेश को सतर्व रहना होगा। नया नैरेटिव गढ़ना पड़ेगा। शायद किसान मुद्दे उठाएं या युवाओं को नौकरी का वादा करें। राजनीति का खेल अनिाित है। प. बंगाल ने एक संकेत दिया है। उप्र में क्या होगा, समय बताएगा। वोटर ही राजा है।
उसकी सोच बदलेगी, तो फार्मूले भी बदलेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) संजय सक्सेना
गंगोत्री से गंगासागर तक वेग के साथ बढ़ती भाजपा की ‘हिदूधारा’
पािम बंगाल में जीत के बाद एक नया ट्रेंड दिखाईं दे रहा है।
पहले जो भाजपा कहा करती थी कि हमें मुसलमानों का वोट नहीं मिलता है, अब वही भाजपा खुलेआम कहती है कि वह हिदुओं के वोट से चुनाव जीती है। इसके साथ ही यह भी जोड़ देती है कि जो हमारे साथ था, हम उसके साथ हैं।
जबकि इससे पहले मोदी कहा करते थे ‘सबका साथ, सबका विकास’। सवाल यह है कि क्या अब बीजेपी बदल रही है? बीजेपी लगातार हिदूधारा के सहारे आगे बढ़ती जा रही है। हिदुओं को एकजुट करने के लिए बीजेपी का यह चुनावी मंत्र कहीं उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के पीडीए की धार तो वुंद नहीं कर देगा, जैसा 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में देखा जा चुका है। कहीं ऐसा न हो कि 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) के सहारे भाजपा को काफी हद तक रोकने में सफल रहे सपा प्रमुख अखिलेश यादव का यह फार्मूला 2027 में धराशायी हो जाए। वैसे भी हर चुनाव में वोटरों की सोच बदलती रहती है।
राजनीति में कोईं भी फार्मूला हमेशा के लिए हिट नहीं होता है।
ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पािम बंगाल में बीजेपी की शानदार जीत ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। वहां की सड़कों पर उत्सव मनाते कार्यंकर्ता चिल्ला रहे हैं कि हम हिदुओं के वोटों से जीते। पहले जहां बीजेपी कहती थी कि मुसलमानों का वोट हमें नहीं मिलता, अब वही दल खुलकर स्वीकार कर रहा है कि हिदू भाइयों के बल पर हमने सत्ता की वुसा हासिल की। साथ ही जोर देकर कहते हैं कि जो हमारे साथ रहा, हम उसके साथ हैं। यह नया सुर सुनकर सवाल उठता है कि क्या बीजेपी अपना रास्ता बदल रही है? प्रधानमंत्री का पुराना नारा तो था ‘सबका साथ, सबका विकास’, लेकिन अब लगता है हिदू एक जुटता का जाप जोर पकड़ रहा है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह बदलाव अखिलेश यादव के पीडीए फॉर्मूले को चुनौती दे सकता है।
दोबारा देखें तो 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में यही हिदू वोटों का ध्रुवीकरण सपा को पटखनी दे चुका है, तो क्या 2024 के लोकसभा चुनाव में सफल रहा पीडीए का जादू अब फीका पड़ जाएगा? बहरहाल, पािम बंगाल में हुईं जीत कोईं साधारण घटना नहीं है। वहां बीजेपी ने टीएमसी के किले को हिलाकर रख दिया। कार्यंकर्ता खुशी से पूले नहीं समा रहे। वे मंचों पर चढ़कर घोषणा कर रहे हैं कि हिदू भाइयों ने हमें चुना, इसलिए हम उनके हितों की रक्षा करेंगे।
पहले बीजेपी पर इल्जाम लगता था कि वह मुसलमान वोटों से वंचित है। अब उसी दल के नेता बिना झिझक कह रहे हैं कि हिदुओं की एकजुटता ही हमारी ताकत है। जो हमारे साथ खड़ा हुआ, हम उसी के साथ खड़े रहेंगे। यह बातें सुनकर विपक्षी दल सन्न रह गए। तृणमूल कांग्रेस तो पहले से ही आरोप लगाती रही है कि बीजेपी ध्रुवीकरण की राजनीति करती है, लेकिन अब बीजेपी खुद इसे स्वीकार कर रही है। क्या यह रणनीति का नया मोड़ है? पािम बंगाल जैसे राज्य में, जहां हिदू आबादी बहुमत में है लेकिन बिखरी हुईं रही, वहां यह नारा काम कर गया। अब सवाल यह है कि क्या यही नारा उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में भी धमाल मचाएगा? उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही जटिल रही है। यहां वोट बैंक की गणित बड़ी बारीकी से सेट होती है। अखिलेश यादव ने 2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए का फार्मूला अपनाया।
पिछड़ों, दलितों और अल्पसंख्यकों को एकजुट कर भाजपा को कड़ी टक्कर दी। सपा ने समाजवादी नीतियों के साथ गठबंधन की ताकत दिखाईं। कईं सीटों पर जीत हासिल की। लेकिन विधानसभा चुनावों का इतिहास वुछ और कहता है। 2017 में भाजपा ने हिदू कार्ड खेला। राम मंदिर का मुद्दा उठाया। गोरखपुर से बनारस तक हिदू एकता का नारा गूंजा। नतीजा, सपा-बसपा गठबंधन धूल चाट गया। फिर 2022 में भी यही हुआ।
योगी आदित्यनाथ ने बुलडोजर की राजनीति से अपराधियों पर नकेल कसी। हिदू वोट सिमटे। सपा का पीडीए फार्मूला पेल हो गया।
अखिलेश यादव पिछड़ों को जोड़ने की कोशिश करते रहे, लेकिन हिदू ध्रुवीकरण ने सब बर्बाद कर दिया।
अब पािम बंगाल की जीत के बाद बीजेपी फिर वही पुराना हथियार उठा रही है। क्या अखिलेश का पीडीए फिर वुंद पड़ जाएगा? जानकार कहते हैं कि राजनीति में वोटरों की सोच बदलती रहती है। हर चुनाव अलग कहानी लिखता है। कोईं फार्मूला हमेशा हिट नहीं होता। 2014 में मोदी लहर चली। ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा गूंजा।
विकास, राष्ट्रवाद और भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम ने कांग्रेस को धराशायी कर दिया। लेकिन 2019 में राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा हावी रहा।
पुलवामा हमला और बालाकोट स्ट्राइक ने हिदू राष्ट्रवाद को पंख दिए। 2024 में विपक्ष ने एकता दिखाईं। इंडिया गठबंधन बना।
उत्तर प्रदेश में पीडीए ने कमाल कर दिया। सपा ने कहा कि हम सबको साथ लेंगे। यादव, मुस्लिम और दलित को जोड़ा। वुछ हद तक सफल रहे। लेकिन अब बीजेपी बंगाल मॉडल को यूपी में आजमाने को तैयार है। वहां हिदू वोटों से जीतकर उत्साहित नेता कह रहे हैं कि यही फार्मूला राष्ट्रीय स्तर पर चलेगा। उत्तर प्रदेश में हिदू आबादी करीब 80™ है। अगर ये एकजुट हो गए, तो पीडीए का क्या होगा? भाजपा के नेता अब खुलकर कह रहे हैं। पािम बंगाल में ममता बनजा की पाटा पर हमला बोला गया कि वे हिदू विरोधी हैं, इसलिए हिदुओं ने हमें चुना। अब उत्तर प्रदेश में भी योगी आदित्यनाथ ऐसा ही करेंगे। बुलडोजर अब भी खड़ा है। कानून-व्यवस्था का डर दिखाकर हिदू वोट साधे जाएंगे।
अखिलेश यादव को चुनौती दी जाएगी कि तुम्हारा पीडीए सिर्प वोट लेने का धंधा है। हम हिदुओं के सच्चे हितैषी हैं। मंदिर-मस्जिद विवाद फिर गरमाएगा। अयोध्या राम मंदिर का श्रेय लिया जाएगा।
काशी और मथुरा पर नजर रखी जाएगी। क्या अल्पसंख्यक वोट सपा के पास टिवेंगे? या डर से बिखर जाएंगे? 2017 और 2022 में यही हुआ था। मुसलमान वोट सपा को मिले, लेकिन हिदू भाजपा के पाले में चले गए।
अब 2027 के विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं। भाजपा बंगाल का जाप यूपी में गूंजाएगी।
अखिलेश यादव की मुश्किल बढ़ सकती है। उनका पीडीए पिछड़ों को लुभाने का प्रयास है। लेकिन हिदू ध्रुवीकरण में ब्राrाण, ठावुर, वैश्य सब भाजपा की गोद में चले जाते हैं। दलित भी कभी-कभी बहुजन समाज पाटा से नाराज होकर भाजपा की ओर झुक जाते हैं। 2024 में सपा ने ब्राrाण चेहरों को आगे किया। वुछ सफलता मिली। लेकिन अगर भाजपा कहे कि हम हिदू एकता के लिए लड़ रहे हैं, तो ब्राrाण वोट फिसल सकते हैं। यादव भाईंचारे पर सपा निर्भर है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में हिदू भावना भड़क सकती है। अखिलेश को नया जवाब ढूंढना होगा। शायद विकास और रोजगार पर जोर दें या गठबंधन मजबूत करें। लेकिन राजनीति में वोटर का मन बदलता है। पािम बंगाल ने दिखा दिया कि हिदू नारा कितना कारगर है।
विपक्षी दलों को भी सोचना होगा।
कांग्रेस और अन्य दल भाजपा के इस नए सुर से परेशान हैं। वे कहते हैं कि यह संविधान विरोधी है।
लेकिन जनता क्या सोचेगी? इस पर उत्तर प्रदेश के गांवों में चाय की दुकानों पर बहस छिड़ जाएगी। कोईं कहेगा भाजपा सही कह रही है, हिदू एकजुट हो जाओ। कोईं बोलेगा अखिलेश सबको साथ लेकर चलेगा। चुनावी रणनीति बदल रही है। भाजपा का ‘सबका साथ’ वाला नारा पीछे छूट रहा है। अब हिदू हित का जाप है।
पािम बंगाल की जीत इसका प्रमाण है। उत्तर प्रदेश में अगर यही चला, तो सपा का पीडीए धराशायी हो सकता है। यह सब वोटरों की सोच पर निर्भर है। हर चुनाव नईं उम्मीदें जगाता है, लेकिन इतिहास दोहराने का खतरा मंडरा रहा है। यह बदलाव भाजपा के लिए बड़ा दांव है। पहले वे सभी को लुभाते थे, अब खुलकर हिदू कार्ड खेल रहे हैं। क्या इससे मुस्लिम वोट पूरी तरह खिसक जाएंगे? या विकास के नाम पर वुछ लौट आएंगे? उप्र में परीक्षा कठिन है। यहां जातियां बिखरी हैं। यादव, जाट, वुमा, मौर्यं सब अलग-अलग सोचते हैं।
पीडीए ने इन्हें जोड़ा था, लेकिन हिदू एकता का नारा इन सबको लपेट सकता है। अखिलेश को सतर्व रहना होगा। नया नैरेटिव गढ़ना पड़ेगा। शायद किसान मुद्दे उठाएं या युवाओं को नौकरी का वादा करें। राजनीति का खेल अनिाित है। प. बंगाल ने एक संकेत दिया है। उप्र में क्या होगा, समय बताएगा। वोटर ही राजा है।
उसकी सोच बदलेगी, तो फार्मूले भी बदलेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) संजय सक्सेना