नेपाल में चल रही PM बालेन की मनमर्जी? 70 साल की परंपरा तोड़कर जूनियर जज को चीफ जस्टिस बनाने की तैयारी
प्रकाशित: 08-05-2026 | लेखक: वीर अर्जुन टीम
नेपाल में करीब 70 साल से चली आ रही एक परंपरा को तोड़ते हुए सुप्रीम कोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश (चीफ जस्टिस) की नियुक्ति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. नेपाल के नए प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह की अगुवाई वाली संवैधानिक परिषद ने सीनियरिटी के नियम को नजरअंदाज करते हुए सुप्रीम कोर्ट के चौथे सबसे सीनियर जज मनोज कुमार शर्मा को चीफ जस्टिस बनाने की सिफारिश कर दी. इस फैसले का परिषद के दो सदस्यों ने विरोध भी किया है.
काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार संवैधानिक परिषद ने सपना प्रधान मल्ला, कुमार रेग्मी और हरि प्रसाद फुयाल को नजरअंदाज कर दिया, जबकि ये तीनों मनोज कुमार शर्मा से सीनियर हैं. इसके बावजूद शर्मा को नेपाल का 33वां मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की गई. छह सदस्यीय परिषद में नेशनल असेंबली के अध्यक्ष और विपक्ष के नेता ने इस फैसले पर अपना विरोध दर्ज कराया.
परिषद के एक सदस्य ने कहा, “सीनियरिटी को नजरअंदाज किए जाने को लेकर हमें आपत्ति थी. हमने संवैधानिक परिषद को लिखित रूप में अपना विरोध सौंप दिया है.” उनके नोट में कहा गया कि वे ऐसे फैसले से सहमत नहीं हो सकते जो स्थापित प्रक्रिया और परंपरा का उल्लंघन करता हो. बैठक में मौजूद एक सदस्य के अनुसार, प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि सिर्फ परंपरा के आधार पर नियुक्तियां नहीं की जा सकतीं. उन्होंने कहा कि चयन प्रक्रिया में योग्यता, विशेषज्ञता और न्यायिक क्षमता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. बालेन शाह का कहना था कि न्याय देने की क्षमता और विशेषज्ञता, वरिष्ठता से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.
इस रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञ पीएम बालेन के इस तर्क से सहमत नहीं हैं. काठमांडू यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ के प्रोफेसर बिपिन अधिकारी ने कहा कि भले नेपाल के संविधान या कानून में ऐसी कोई जबरदस्ती नहीं है कि सबसे सीनियर जज को ही चीफ जस्टिस बनाया जाए, लेकिन ऐसा फैसला लेने के लिए बहुत मजबूत और संस्थागत कारण होने चाहिए. उन्होंने कहा कि मुझे इस बदलाव के पीछे कोई मजबूत कारण नहीं दिखता. उन्होंने कहा कि मजबूत कारणों के बिना सीनियर जजों को नजरअंदाज कर जूनियर जज की चीफ के तौर पर नियुक्ति करने से न्यायपालिका पर सरकार के प्रभाव की आशंका बढ़ सकती है. “इससे ऐसी स्थिति बन सकती है जहां जज फैसले देते समय सावधान रहने लगें, क्योंकि उन्हें डर हो कि इससे उनका प्रमोशन रुक सकता है.”
काठमांडू पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार संवैधानिक परिषद ने सपना प्रधान मल्ला, कुमार रेग्मी और हरि प्रसाद फुयाल को नजरअंदाज कर दिया, जबकि ये तीनों मनोज कुमार शर्मा से सीनियर हैं. इसके बावजूद शर्मा को नेपाल का 33वां मुख्य न्यायाधीश बनाने की सिफारिश की गई. छह सदस्यीय परिषद में नेशनल असेंबली के अध्यक्ष और विपक्ष के नेता ने इस फैसले पर अपना विरोध दर्ज कराया.
परिषद के एक सदस्य ने कहा, “सीनियरिटी को नजरअंदाज किए जाने को लेकर हमें आपत्ति थी. हमने संवैधानिक परिषद को लिखित रूप में अपना विरोध सौंप दिया है.” उनके नोट में कहा गया कि वे ऐसे फैसले से सहमत नहीं हो सकते जो स्थापित प्रक्रिया और परंपरा का उल्लंघन करता हो. बैठक में मौजूद एक सदस्य के अनुसार, प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने अपने फैसले का बचाव करते हुए कहा कि सिर्फ परंपरा के आधार पर नियुक्तियां नहीं की जा सकतीं. उन्होंने कहा कि चयन प्रक्रिया में योग्यता, विशेषज्ञता और न्यायिक क्षमता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए. बालेन शाह का कहना था कि न्याय देने की क्षमता और विशेषज्ञता, वरिष्ठता से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.
इस रिपोर्ट के अनुसार विशेषज्ञ पीएम बालेन के इस तर्क से सहमत नहीं हैं. काठमांडू यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ लॉ के प्रोफेसर बिपिन अधिकारी ने कहा कि भले नेपाल के संविधान या कानून में ऐसी कोई जबरदस्ती नहीं है कि सबसे सीनियर जज को ही चीफ जस्टिस बनाया जाए, लेकिन ऐसा फैसला लेने के लिए बहुत मजबूत और संस्थागत कारण होने चाहिए. उन्होंने कहा कि मुझे इस बदलाव के पीछे कोई मजबूत कारण नहीं दिखता. उन्होंने कहा कि मजबूत कारणों के बिना सीनियर जजों को नजरअंदाज कर जूनियर जज की चीफ के तौर पर नियुक्ति करने से न्यायपालिका पर सरकार के प्रभाव की आशंका बढ़ सकती है. “इससे ऐसी स्थिति बन सकती है जहां जज फैसले देते समय सावधान रहने लगें, क्योंकि उन्हें डर हो कि इससे उनका प्रमोशन रुक सकता है.”