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हिंसक राजनीति पर रोक जरूरी

प्रकाशित: 08-05-2026 | लेखक: सदानंद पांडे
हिंसक राजनीति पर रोक जरूरी
पश्चिम बंगाल चुनाव के बाद की सबसे बड़ी हिंसक घटना में भाजपा नेता शुभेन्दु अधिकारी के सहयोगी चन्द्रनाथ रथ की नृशंस हत्या बुधवार की रात कर दी गईं। एयरफोर्स के पूर्व अधिकारी 42 वषीय रथ की हत्या से इतनी राजनीतिक बवंडर उठा है कि दूसरी राजनीतिक गतिविधियां अपने आप दब गईं हैं।
दरअसल पश्चिम बंगाल के चुनाव हमेशा हिंसक रहे हैं। 1947 से 1971 तक कांग्रेस की सरकारें रहीं, उस वक्त राज्य में हिंसक वातावरण नहीं था। किन्तु 1971 से 2011 तक कम्युनिस्ट सरकार के दौरान राज्य में चुनाव के पहले हिंसा इसलिए होती थी ताकि विपक्षी पार्टियों के समर्थक वोट न दे सवें। लेकिन ममता की सरकार ने 2011 से 2026 तक इस चुनावी हिंसा का विस्तार किया। इसके लिए टीएमसी वैडर ने चुनाव के बाद जिन लोगों ने उनकी पाटी को वोट नहीं दिया उन्हें सबक सिखाने के उद्देश्य से उनके साथ मार पीट करते रहे हैं। टीएमसी के कार्यंकर्ता स्थानीय चुनावों में भाजपा, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियांे की ओर से खड़े होने वाले प्रत्याशियों का नामांकन करने से रोक देते और यदि वे किसी तरह कोर्ट कचहरी की मदद से नामांकन करने में सफल भी हो गए तो उनके समर्थकों की खैर नहीं।
विपक्षी कार्यंकर्ताओं और वोटरों की हत्याएं तो सामान्य बात है। चुनाव आयोग की सव्रियता और पश्चिम बंगाल पुलिस की अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था के कारण चुनाव के दौरान तो राजनीतिक हत्याएं नहीं हुईं किन्तु चन्द्रनाथ रथ की हत्या के बाद लगता है कि राज्य में एक बार फिर हत्याओं का दौर शुरू हो जाएगा। मामले की गंभीरता को देखते हुए इस हत्या की जांच केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानि सीबीआईं को सौंप कर सरकार ने सव्रियता दिखाईं ताकि राज्य में भय का माहौल कायम न हो सके। केन्द्र ने अपनी सव्रियता का संदेश देने के लिए ही बृहस्पतिवार को विधानसभा भंग करके राज्यपाल को शासन अपने हाथ में लेने और सक्षम कार्रवाईं के लिए प्रभावी संदेश दिया।
बहरहाल पश्चिम बंगाल की रक्त संस्वृति का समापन तो निश्चित है किन्तु इसमें समय लगेगा क्योंकि जब तक बांगलादेशी घुसपैठियों का पूरी तरह सफाया नहीं हो जाता तब तक हिंसा की छिटपुट घटनाएं होती रहेंगी। फिलहाल अब राज्य में प्राथमिकताओं के हिसाब से नागरिक सुरक्षा पर ध्यान दिया जाना चाहिए ताकि किसी और की हत्या न हो सके। किन्तु इसके लिए राज्य में सबसे पहले स्थानीय पुलिस को राजनीतिक कार्यंकर्ता से वापस पुलिस कमी तथा पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को पुलिसिंग की एथिक्स सिखाना आवश्यक है। आने वाली सरकार के सामने यह बड़ी चुनौती होगी कि वह इतने बड़े पुलिस संगठन को वैसे सुधारे। लब्बोलुआब यह है कि पश्चिम बंगाल में लक्षित आपराधिक एवं हिंसक घटनाओं से छुटकारा दिलाने के लिए आने वाली नईं सरकार को कईं स्तर पर सव्रियता दिखानी होगी उसमें अब तक का सबसे प्रामाणिक माडल योगी सरकार का रहा है जिसे अपनाकर पश्चिम बंगाल को देश के शान्तिप्रिय राज्यों की सूची में शामिल किया जा सकेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद नईं दिल्ली में यही सूत्र वाक्य बोला था कि ‘बदला नहीं बदलाव की जरूरत’ है।