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युद्ध-सुरक्षा परियोजना पर कांग्रेस की काली नजर

प्रकाशित: 08-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
युद्ध-सुरक्षा परियोजना पर कांग्रेस की काली नजर
अब असम और बांग्लादेश में भाजपा की जीत से तय है कि घुसपैठ पर तो अंवुश लगेगा ही, आए घुसपैठियों को भी खदेड़ने का सिलसिला शुरू होगा। साफ है, इस बहुउद्देशीय परियोजना का विकास भारत की सामरिक रणनीति का हिस्सा है।
गोया, देश की जनता के समक्ष सवाल उठता है कि देश की रक्षा के साथ कौन खड़ा है? युद्ध-सुरक्षा परियोजना पर कांग्रेस की काली नजर महान निकोबार ढांचागत परियोजना के विकास पर कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने गलतबयानी करके इस परियोजना को घोटाला करार देते हुए पर्यांवरण और आदिवासी समुदायों के खिलाफ बता दिया। कितु इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय सेना के पूर्व एयर चीफ मार्शल राकेश वुमार सिह भदौरिया ने करारा जबाब देते हुए इस विकास को सामरिक महत्व के साथ होर्मुज स्ट्रेट का विकल्प भी बता दिया।
भदौरिया का कहना है कि ‘भारत के लिए इस क्षेत्र में सैन्य रणनीतिक उपस्थिति तय करना अत्यंत आवश्यक है। यह होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने की स्थिति में जहाजों की आवाजाही का विकल्प बन सकता है।‘ दरअसल राहुल गांधी ने हाल ही में निकोबार द्वीप का भ्रमण किया था। जहां वे निकोबारी समुदाय के नेताओं से भी मिले। इन नेताओं ने इस महान संरचनात्मक परियोजना को लेकर चिता जताईं थी। क्योंकि इस परियोजना के प्रभाव में वुछ आदिवासी समुदाय आ रहे हैं। याद रहे इससे पहले सोनिया गांधी ने परियोजना पर नाराजगी जताते हुए अंग्रेजी अखबार में लिखे एक लेख में कहा था, ‘शोम्पेन और निकोबारी जनजातियों का अस्तित्व इस परियोजना के चलते दांव पर है।
भविश्य की पीढ़ियों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता एक विषिश्ट पारिस्थितिकी तंत्र के विनाष की अनुमति नहीं दे सकती। हमें न्याय के इस उपहास और राष्ट्रीय मूल्यों के साथ इस विष्वासघात के विरुद्ध अपनी आवाज उठानी चाहिए।‘ दरअसल कांग्रेस देश की रक्षा से जुड़ी इस परियोजना को काली नजर लगाना चाहती है।
दूरांचल में समुद्र तटीय क्षेत्रों में भारत विकास की दृष्टि से पीछे रहा है। उन तटीय क्षेत्रों पर भी हमने ध्यान नहीं दिया, जो देश के लिए नईं आर्थिकि और चीन जैसे धोखेबाज देश से चुनौती के लिए सामरिक दृष्टि से अहम् हो सकते हैं। महान निकोबार अर्थात अंडमान-निकोबार द्वीप समूह इस नाते अछूता है। इस परिप्रेक्ष्य में हम इस क्षेत्र को एक तो प्रसिद्ध सेल्यूलर जेल के नाम से जानते हैं, जो अब राष्ट्रीय स्मारक है। दूसरे उन जनजातियों के लिए जानते हैं, जो आज भी भारत की मुख्यधारा का हिस्सा नहीं बन पाईं हैं। नतीजतन अपनी परंपरागत प्रावृतिक अवस्था में रहकर प्रवृति से ही गुजर-बसर कर रही हैं। कितु अब इस उपेक्षित क्षेत्र की तस्वीर बदलने जा रही है।
सिगापुर की तर्ज पर निकोबार के तट का विकास वेंद्र सरकार बड़ी मात्रा में धन का निवेश करके महान निकोबार द्वीप परियोजना (जीएनआईं) के अंतर्गत कर रही है। 92 हजार करोड़ की इस बृहद परियोजना के तहत कईं परियोजनाओं को अंजाम तक पहुंचाने की तैयारी है।
निकोबार द्वीप समूह 10000 44 वर्ग किमी क्षेत्र में पैला है।
बंगाल की खाड़ी में पोत परिवहन को नया आयाम देते हुए 10000 करोड़ रुपए की लागत से एक पोतांतरण बंदरगाह (ट्रांसशिपमेंट पोर्ट) का निर्माण करने की योजना प्रस्तावित है। यह बंदरगाह विकास से जुड़ी गतिविधियों के बड़े वेंद्र के रूप में विकसित होगा। इस बंदरगाह को समुद्री जल मार्ग की प्रमुख गतिविधियों के वेंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। वैसे भी यह क्षेत्र दुनिया के कईं पोतांतरण बंदरगाहों की तुलना में काफी प्रतिस्पर्धा दूरी पर स्थित है।
बदलती जरूरतों के परिप्रेक्ष्य में पूरी दुनिया यह मानकर चल रही है कि जिस देष में हवाईं अड्डों और बंदरगाहों का नेटवर्व और कनेक्टिविटि जितनी बेहतर होगी, 21वीं सदी के व्यापार में वही देश अग्रणी रहेंगे।
इस द्वीप पर विकसित किए जा रहे माल-परिवहन के दो रणनीतिक वंटेनर पोतांतरण र्टमिनल के दो भौगोलिक फायदे होंगे। पहला यह व्यस्त पूवा-पश्चिमी अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी मार्ग के निकट है।
अतएव शुरू होने के बाद यह पोतांतरण की बेहतर सुविधा देगा, नतीजतन व्यापारिक गतिविधियां बढ़ंेगी। दूसरे इस क्षेत्र में आधुनिक ढंग से र्निमित जहाजों से माल उतारने-चढ़ाने की सुविधाएं बंदरगाह पर उपलब्ध होंगी, इस कारण बड़े जहाजों की आवाजाही बढ़ेगी। अंडमान-निकोबार द्वीप प्रषासन ने वुछ समय पहले ही महान निकोबार द्वीप की दक्षिणी खाड़ी में मुत्त व्यापार भंडारण क्षेत्र विकसित करने के लिए वंटेनर पोतांतरण र्टमिनल के लिए प्रािया आरंभ की है। इससे भारतीय पोत परिवहन को कोलांबो (लंका), सिगापुर और मलेशिया के क्लांग बंदरगाह में पोतांतरण का नया विकल्प हासिल होगा। अंडमाननिकोबार का ढांचागत विकास हो जाने पर यहां मछली पालन एक्वाकल्चर और सीवीड फर्ॉमिग का कारोबार बढ़ेगा। भारत के व्यापारी ही नहीं दुनिया के कईं देश इस परिप्रेक्ष्य में व्यापार की बड़ी संभावनाएं देख रहे हैं। भारत में लगभग 8,118 किमी समुद्र तटीय क्षेत्र है। इस पूरे क्षेत्र में मछलियों और समुद्री शैवाल व एल्गी का बड़ी मात्रा में प्रावृतिक रूप से उत्पादन होता है। महान अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का निकोबार क्षेत्र आरक्षित जैवमंडल (बायोस्फीयर) क्षेत्र में आता है। इसे 2013 में विशेष जैवमंडल का दर्जा दिया गया था। भारत में वुल 18 जैवमंडल क्षेत्र हैं, उनमें से एक निकोबार जनजातीय (आदिवासी) आरक्षित वन-भूमि की श्रेणी में है। इस समुद्री क्षेत्र में विशेष प्रजाति के लैदरबैक कछुए, खारे पानी में रहने वाले मगरमच्छ, निकोबारी केकड़े खाने वाले मकाक और प्रवासी पक्षी षामिल हैं। जिनका इस बहुआयामी विकास परियोजना से प्रभावित होना तय है। इस कारण पर्यांवरणविद् यह आशंका जता रहे हैं कि इससे यहां के प्राचीन र्वषा वनों को भारी क्षति होगी। इन्हें हानि होगी तो कईं दुर्लभ प्राणी व वनस्पतियों की प्रजातियां और इस भू-भाग का मानसून भी प्रभावित होगा। यही नहीं निकोबार द्वीप समूह में गिनती के रह गए जो जनजातीय समूह आदिम अवस्था में रहते हैं, उनका नैस्रगिक जीवन भी प्रभावित होने की आशंका जताईं जा रही है। इनमें शोम्पेन और निकोबारी वनवासी जनजातियां शामिल हैं। इनकी संख्या करीब 1761 है। निकोबार में एक विषेश प्रजाति का नहीं उड़ सकने वाला पक्षी मेगापॉड का भी घर है। इनके वुल 51 घोंसले हैं, जिनमें से 30 पूरी तरह नष्ट कर दिए जाएंगे। हालांकि भारतीय प्राणी सव्रेक्षण और अंडमान-निकोबार प्रशासन के वन एवं पर्यांवरण विभाग ने दावा किया है कि परियोजना से वन और प्राणियों को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा।
मैंग्रोव वृक्षों के संरक्षण और दस हेक्टेयर में पैली मूंगा चट्टानों की 20,668 बस्तियों में से 16,150 बस्तियों की सुरक्षा मूल स्थान से खिसकाकर की जा रही है। इसके तहत सैन्य-नागरिक उपयोग के लिए आवागमन के श्रेष्ठ उपाय किए जा रहे हैं। यहां के अधिकतर विकास कार्यं भी नौसेना के नियंत्रण में होने हैं। महान निकोबार द्वीप देश के सुदूर और दुर्गम क्षेत्र का दक्षिणी भाग है। यहां से बंगाल की खाड़ी, दक्षिण और दक्षिण-पूवा एषियाईं सागर क्षेत्र में भारत को सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण व उपयोगी नियंत्रण की सुविधा इस क्षेत्र के संपूर्ण विकास के बाद हासिल हो जाने की उम्मीद है।
दरअसल इसी दक्षिण सागर में चीन का जबरदस्त हस्तक्षेप है। चीन का प्रमुख व्यापार और साम्राज्यवादी दबदबा इसी मलक्का जलडमरू मध्य में सबसे ज्यादा है। लंका तो यहां से निकट है ही, इंडोनेशिया का सुमात्रा द्वीप भी बमुश्किल 90 किमी की दूरी पर है। यह स्थल मलक्का जलडमरूमध्य के पश्चिमी प्रवेश द्वार के करीब है। खाड़ी से तेल ले जाने वाले और पश्चिम में वस्तुओं का निर्यांत करने वाले चीनी जहाज मलक्का जलडमरूमध्य से ही गुजरते हैं।
अतएव निकोबार द्वीप पर सैन्य सामग्री व युद्धपोतों को रखने एवं बनाने के लिए डॉकयार्ड भी यहां बनाए जा सकते हैं। इस क्षेत्र को सैन्य हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। याद रहे, फ्लोरिडा में पाकिस्तान के एयर चीफ मार्शल आसिम मुनीर 9 अगस्त 2025 को कहा था कि अगली बार पाकिस्तान पूवा मोच्रे से लड़ाईं शुरू करेगा, क्योंकि वहां भारत ने अपने कीमती संसाधन स्थापित किए हुए हैं। साफ है, यह क्षेत्र अति संवेदनशील है। यहां के मानचित्र को देखें तो इस 3416 किमी लंबे पूवा समुद्री तट पर बंगाल की खाड़ी से सटी बांग्लादेश की 600 किमी लंबी समुद्री सीमा है।
इसके बाद म्यांमार की 2227 किमी लंबी समुद्री सीमा जुड़ी है।
फिर थाईंलैंड है। इसके दक्षिण में अंडमान-निकोबार सागर मलक्का के संकीर्ण मार्ग से होकर प्रशांत महासागर में पहुंचता है। हम जानते हैं कि बांग्लादेश और म्यांमार ही वे देश हैं, जहां से बांग्लादेशी मुस्लिम और म्यांमार के रोहिग्यों ने सबसे ज्यादा घुसपैठ करके सीमांत जिलों का जनसंख्यात्मक घनत्व बिगाड़ दिया है, यहीं चीन का दबदबा बना रहता है। हालांकि अब असम और बांग्लादेश में भाजपा की जीत से तय है कि घुसपैठ पर तो अंवुश लगेगा ही, आए घुसपैठियों को भी खदेड़ने का सिलसिला शुरू होगा। साफ है, इस बहुउद्देशीय परियोजना का विकास भारत की सामरिक रणनीति का हिस्सा है। गोया, देश की जनता के समक्ष सवाल उठता है कि देश की रक्षा के साथ कौन खड़ा है? (लेखक वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार हैं।) प्रमोद भार्गव