तुर्की, हम नहीं भूलेंगे : ऑपरेशन सिदूर की पहली वर्षगांठ पर एक स्मरण
प्रकाशित: 08-05-2026 | लेखक: आदित्य नरेंद्र
भारत केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं है, यह करोड़ों देशवासियों की भावनाओं, त्याग और बलिदान का राष्ट्र है। जब भी देश की सुरक्षा पर संकट आता है, भारतीय सेना अपने प्राणों की आहुति देकर हमारे सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा करती है। ऐसे समय में हर भारतीय का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपने सैनिकों के साथ खड़ा रहे केवल शब्दों में नहीं, बल्कि अपने कर्मो में भी।
ऑपरेशन सिदूर की पहली वर्षगांठ पर हमें उन घटनाओं को याद करना चाहिए जब कठिन समय में वुछ देशों ने खुले या परोक्ष रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया। तुर्की उन देशों में प्रमुख था जिसने भारत की चिताओं को ऩजरअंदा़ज करते हुए पाकिस्तान के पक्ष में बयान और सहयोग दिया। यह केवल वूटनीतिक मुद्दा नहीं था, बल्कि उन भारतीय सैनिकों के सम्मान का प्रश्न था जो सीमा पर देश की रक्षा कर रहे थे।
आज भी बड़ी संख्या में भारतीय पर्यंटक तुका को पर्यंटन के लिए चुनते हैं। हर वर्ष करोड़ों रुपये भारतीयों द्वारा वहां के पर्यंटन, होटल और व्यापार पर खर्च किए जाते हैं। हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए क्या हमारा पैसा ऐसे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करे जो भारत के विरोधियों के साथ खड़ा दिखाईं देता है? यह किसी देश या उसके आम नागरिकों के प्रति घृणा का संदेश नहीं है। भारत की संस्वृति वसुधैव वुटुम्बकम् की रही है। परंतु राष्ट्रहित सवरेपरि होता है। जब आर्थिक निर्णयों का संबंध राष्ट्रीय सम्मान और सुरक्षा से जुड़ जाए, तब जागरूक नागरिक होना आवश्यक है। भारत में ही असीम सुंदरता, इतिहास और संस्वृति मौजूद है। कश्मीर की वादियां, उत्तराखंड के पर्वत, राजस्थान के किले, केरल के बैकवॉटर्स, अंडमान के समुद्र तट हमारे अपने देश में विश्वस्तरीय पर्यंटन स्थल हैं।
यदि भारतीय अपने ही देश में पर्यंटन को बढ़ावा दें, तो इससे देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और स्थानीय व्यवसायों को मजबूती मिलेगी।
ऑपरेशन सिदूर की वर्षगांठ केवल एक सैन्य अभियान की याद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का अवसर है। हमें याद रखना चाहिए कि देशभत्ति केवल सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हमारे आर्थिक और सामाजिक निर्णय भी राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर होने चाहिए। जो सेना हमारे लिए सीमा पर खड़ी है, क्या हम उनके सम्मान में इतना भी नहीं कर सकते कि अपने खर्च और समर्थन को सोच-समझकर चुनें? राष्ट्र प्रथम। जय हिद।
ऑपरेशन सिदूर की पहली वर्षगांठ पर हमें उन घटनाओं को याद करना चाहिए जब कठिन समय में वुछ देशों ने खुले या परोक्ष रूप से पाकिस्तान का समर्थन किया। तुर्की उन देशों में प्रमुख था जिसने भारत की चिताओं को ऩजरअंदा़ज करते हुए पाकिस्तान के पक्ष में बयान और सहयोग दिया। यह केवल वूटनीतिक मुद्दा नहीं था, बल्कि उन भारतीय सैनिकों के सम्मान का प्रश्न था जो सीमा पर देश की रक्षा कर रहे थे।
आज भी बड़ी संख्या में भारतीय पर्यंटक तुका को पर्यंटन के लिए चुनते हैं। हर वर्ष करोड़ों रुपये भारतीयों द्वारा वहां के पर्यंटन, होटल और व्यापार पर खर्च किए जाते हैं। हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए क्या हमारा पैसा ऐसे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करे जो भारत के विरोधियों के साथ खड़ा दिखाईं देता है? यह किसी देश या उसके आम नागरिकों के प्रति घृणा का संदेश नहीं है। भारत की संस्वृति वसुधैव वुटुम्बकम् की रही है। परंतु राष्ट्रहित सवरेपरि होता है। जब आर्थिक निर्णयों का संबंध राष्ट्रीय सम्मान और सुरक्षा से जुड़ जाए, तब जागरूक नागरिक होना आवश्यक है। भारत में ही असीम सुंदरता, इतिहास और संस्वृति मौजूद है। कश्मीर की वादियां, उत्तराखंड के पर्वत, राजस्थान के किले, केरल के बैकवॉटर्स, अंडमान के समुद्र तट हमारे अपने देश में विश्वस्तरीय पर्यंटन स्थल हैं।
यदि भारतीय अपने ही देश में पर्यंटन को बढ़ावा दें, तो इससे देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और स्थानीय व्यवसायों को मजबूती मिलेगी।
ऑपरेशन सिदूर की वर्षगांठ केवल एक सैन्य अभियान की याद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना का अवसर है। हमें याद रखना चाहिए कि देशभत्ति केवल सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं होनी चाहिए। हमारे आर्थिक और सामाजिक निर्णय भी राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर होने चाहिए। जो सेना हमारे लिए सीमा पर खड़ी है, क्या हम उनके सम्मान में इतना भी नहीं कर सकते कि अपने खर्च और समर्थन को सोच-समझकर चुनें? राष्ट्र प्रथम। जय हिद।