संकट की घड़ी में दुनिया की संजीवनी है रेडक्रॉस
प्रकाशित: 08-05-2026 | लेखक: संपादकीय टीम
रेडक्रॉस की स्थापना महान् मानवता प्रेमी जीन हेनरी डयूनेंट द्वारा की गईं थी, इसीलिए उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रतिवर्ष विश्वभर में 8 मईं का दिन ‘अंतर्राष्ट्रीय रेडक्रॉस दिवस’ के रूप में मनाया जाता है और संस्था की गतिविधियों से आम आदमी को अवगत कराने के प्रयास किए जाते हैं। रेडव्रॉस की स्थापना वर्ष 1863 में हुईं थी और अंतर्राष्ट्रीय रेडव्रॉस सोसायटी दुनिया के सभी देशों में रेडव्रॉस आन्दोलन का प्रसार करने के साथ-साथ रेडव्रॉस के आधारभूत सिद्धांतों के संरक्षक के रूप में भी कार्यं कर रही है। 8 मईं 1828 को जन्मे डयूनेंट 1859 में हुईं सालफिरोनो (इटली) की लड़ाईं में घायल सैनिकों की दुर्दशा देख बहुत आहत हुए थे क्योंकि युद्धभूमि में पड़े इन घायल सैनिकों के उपचार के लिए कोईं चिकित्सा व्यवस्था उपलब्ध नहीं थी। युद्ध मैदान में घायल पड़े इन्हीं सैनिकों के दर्दनाक हालातों पर अपने कड़वे अनुभवों के आधार पर उन्होंने ‘मेमोरी और सालफिरोनो’ नामक एक पुस्तक भी लिखी और 1863 में रेडव्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति ‘आईंसीआरआईं’ का गठन किया। डयूनेंट के सतत प्रयासों की बदौलत ही 1864 में जेनेवा समझौते के तहत ‘अंतर्राष्ट्रीय रेडव्रॉस मूवमेंट’ की स्थापना हुईं।
डयूनेंट ने इटली में युद्ध के दौरान रत्तपात का ऐसा भयानक मंजर देखा था, जब चिकित्सकीय सहायता के अभाव में युद्धक्षेत्र में अनेक घायल सैनिक हृदयविदारक कष्टों से तड़प रहे थे। ऐसे घायलों की सहायता के लिए उन्होंने स्थायी समितियों के निर्माण की आवश्यकता को लेकर आवाज बुलंद की, जिसका असर भी दिखा। युद्ध में आहतों की स्थिति के सुधार के साधनों का अध्ययन करने के लिए उसके बाद एक आयोग का गठन किया गया। 1863 में जेनेवा में एक अंतर्राष्ट्रीय बैठक में रेडव्रॉस के आधारभूत सिद्धांत निर्धारित किए गए तथा रेडव्रॉस आन्दोलन का विकास करते हुए आहत सैनिकों और युद्ध पीडितों की सहायता संगठित करने हेतु दुनियाभर के सभी देशों में राष्ट्रीय समितियां बनाने पर जोर दिया गया।
नेपोलियन तृतीय के हस्तक्षेप के चलते अंतर्राष्ट्रीय समिति ‘स्विस पेडरल काउंसिल’ को 8 अगस्त 1864 को जेनेवा में सम्मेलन बुलाने के लिए राजी करने में सफल हुईं, जिसमें 26 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इस सम्मेलन के चलते जेनेवा अधिवेशन हुआ, जिसमें सुरक्षा के प्रतीक रेडव्रॉस वाले सपेद झंडे पर स्वीवृति की मोहर लगाईं गईं, जो आज समस्त विश्व में रेडव्रॉस का प्रतीक चिन्ह बना हुआ है।
शुरूआती दौर में रेडव्रॉस की भूमिका युद्ध के दौरान बीमार और घायल सैनिकों, युद्ध करने वालों और युद्धबंदियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना तथा उन्हें उचित उपचार सुविधाएं उपलब्ध कराने तक ही सीमित थी किन्तु अब इस संस्था के दायित्वों का दायरा लगातार विस्तृत होता जा रहा है। मानवीय सेवा को सर्मपित रेडव्रॉस ने प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अनेक घायल सैनिकों तथा नागरिकों की सहायता कर अनुकरणीय उदाहरण पेश किया था। दुनिया के किसी भी भाग में जब भूकम्प, बाढ़, भू-स्खलन या अन्य किसी भी प्रकार की प्रावृतिक अथवा मानवीय आपदा सामने आती है तो सबसे पहले ‘अंतर्राष्ट्रीय रेडव्रॉस सोसायटी’ की टीमें वहां पहुंचकर राहत कार्यो में जुट जाती हैं। शांति और सौहार्द के प्रतीक के रूप में जानी जाने वाली इस संस्था ने अपने कर्मठ, सर्मपित और कत्र्तव्यनिष्ठ स्वयंसेवकों के माध्यम से न केवल भारत में बल्कि दुनियाभर में अपनी एक अलग पहचान बनाईं है।
फिलहाल 190 से भी अधिक देशों में ‘रेडव्रॉस’ संस्था सव्रिय है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) योगेश वुमार गोयल
डयूनेंट ने इटली में युद्ध के दौरान रत्तपात का ऐसा भयानक मंजर देखा था, जब चिकित्सकीय सहायता के अभाव में युद्धक्षेत्र में अनेक घायल सैनिक हृदयविदारक कष्टों से तड़प रहे थे। ऐसे घायलों की सहायता के लिए उन्होंने स्थायी समितियों के निर्माण की आवश्यकता को लेकर आवाज बुलंद की, जिसका असर भी दिखा। युद्ध में आहतों की स्थिति के सुधार के साधनों का अध्ययन करने के लिए उसके बाद एक आयोग का गठन किया गया। 1863 में जेनेवा में एक अंतर्राष्ट्रीय बैठक में रेडव्रॉस के आधारभूत सिद्धांत निर्धारित किए गए तथा रेडव्रॉस आन्दोलन का विकास करते हुए आहत सैनिकों और युद्ध पीडितों की सहायता संगठित करने हेतु दुनियाभर के सभी देशों में राष्ट्रीय समितियां बनाने पर जोर दिया गया।
नेपोलियन तृतीय के हस्तक्षेप के चलते अंतर्राष्ट्रीय समिति ‘स्विस पेडरल काउंसिल’ को 8 अगस्त 1864 को जेनेवा में सम्मेलन बुलाने के लिए राजी करने में सफल हुईं, जिसमें 26 देशों के प्रतिनिधि शामिल हुए। इस सम्मेलन के चलते जेनेवा अधिवेशन हुआ, जिसमें सुरक्षा के प्रतीक रेडव्रॉस वाले सपेद झंडे पर स्वीवृति की मोहर लगाईं गईं, जो आज समस्त विश्व में रेडव्रॉस का प्रतीक चिन्ह बना हुआ है।
शुरूआती दौर में रेडव्रॉस की भूमिका युद्ध के दौरान बीमार और घायल सैनिकों, युद्ध करने वालों और युद्धबंदियों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाना तथा उन्हें उचित उपचार सुविधाएं उपलब्ध कराने तक ही सीमित थी किन्तु अब इस संस्था के दायित्वों का दायरा लगातार विस्तृत होता जा रहा है। मानवीय सेवा को सर्मपित रेडव्रॉस ने प्रथम तथा द्वितीय विश्वयुद्ध में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए अनेक घायल सैनिकों तथा नागरिकों की सहायता कर अनुकरणीय उदाहरण पेश किया था। दुनिया के किसी भी भाग में जब भूकम्प, बाढ़, भू-स्खलन या अन्य किसी भी प्रकार की प्रावृतिक अथवा मानवीय आपदा सामने आती है तो सबसे पहले ‘अंतर्राष्ट्रीय रेडव्रॉस सोसायटी’ की टीमें वहां पहुंचकर राहत कार्यो में जुट जाती हैं। शांति और सौहार्द के प्रतीक के रूप में जानी जाने वाली इस संस्था ने अपने कर्मठ, सर्मपित और कत्र्तव्यनिष्ठ स्वयंसेवकों के माध्यम से न केवल भारत में बल्कि दुनियाभर में अपनी एक अलग पहचान बनाईं है।
फिलहाल 190 से भी अधिक देशों में ‘रेडव्रॉस’ संस्था सव्रिय है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।) योगेश वुमार गोयल